विस्तृत उत्तर
नारायण कवच श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कन्ध के आठवें अध्याय में वर्णित एक अत्यंत शक्तिशाली रक्षा-मंत्र है। इसे सर्वप्रथम ऋषि विश्वरूप ने इन्द्र को दिया था, जिससे देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की थी। बाद में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को इसका उपदेश दिया।
नारायण कवच क्या है: यह भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों — केशव, गोविन्द, नारायण, विष्णु, मधुसूदन, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर और उनके दशावतारों — से चौबीसों घंटे, दसों दिशाओं से सुरक्षा माँगने की प्रार्थना है। इस कवच में शरीर के अंग-प्रत्यंग पर भगवान के विभिन्न स्वरूपों का न्यास किया जाता है।
इसे पढ़ने की विधि: स्नान करके शुद्ध आसन पर बैठें। पहले गणेश और भगवान नारायण को नमस्कार करें। फिर न्यास (शरीर पर मंत्रों का स्पर्श) करके 'ॐ नमो नारायणाय' या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र के साथ कवच का पाठ करें। प्रातःकाल या संध्याकाल का समय सर्वोत्तम है। गुरुवार, एकादशी और भगवान विष्णु के पवित्र दिनों में पाठ का विशेष महत्व माना जाता है। संकट और विपत्ति के समय भी इसका पाठ रक्षा-सहायक माना गया है।





