नारद पुराण से श्री मारुति कवच
कवच का पूर्ण पाठ
नारद पुराण में वर्णित श्री मारुति कवच में हनुमान जी के विभिन्न नामों और स्वरूपों द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा की प्रार्थना की गई है। इसका आरंभ निम्न श्लोकों से होता है:
पातु प्रतीच्यामक्षघ्नः सौम्ये सागरतारकः॥"
यह पारंपरिक कवच निर्माण शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
अध्याय संदर्भ
यह कवच श्रीबृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग के बृहदुपाख्यान के तृतीय पाद में "हनुमत्कवचनिरूपणं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः" (अध्याय 78) के अंतर्गत आता है।
लाभ एवं प्रयोग विधि
इस कवच के पाठ या धारण करने से सभी प्रकार के उपद्रव नष्ट हो जाते हैं तथा भूत-प्रेत एवं शत्रु से उत्पन्न दुःख का तत्काल निवारण होता है। इसे अष्टगंध से लिखकर कंठ अथवा दाहिनी बांह में धारण करने से साधक को प्रत्येक पद पर विजय प्राप्त होती है। यदि आदरपूर्वक लाख बार जप करके इसे सिद्ध कर लिया जाए, तो यह असाध्य कार्यों को भी सिद्ध करने में सक्षम है।
विश्लेषण
नारद पुराण का यह मारुति कवच अपेक्षाकृत सरल भाषा में होते हुए भी व्यापक फलश्रुति प्रदान करता है। विभिन्न नामों द्वारा अंगरक्षा की प्रार्थना पारंपरिक कवच निर्माण शैली को दर्शाती है और इसे साधकों के लिए सुगम बनाती है।
