विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण के द्वितीय स्कन्ध (२.१.२६ और २.५.३८) के अनुसार जब भगवान के ब्रह्मांडीय स्वरूप की कल्पना की जाती है तो पाताल से लेकर भूलोक तक का हिस्सा उनके चरणों और कटि (कमर) भाग में स्थित माना जाता है। शुकदेव गोस्वामी स्पष्ट करते हैं कि मध्यवर्ती लोक जिनका आरंभ भुवर्लोक से होता है भगवान के नाभि-कमल (navel) में स्थित हैं और स्वर्लोक आदि उच्च लोक उनके वक्षस्थल और सिर में स्थित हैं। देवी भागवत पुराण में भी इस लोक को देवी के ब्रह्मांडीय स्वरूप की नाभि के रूप में ही वर्णित किया गया है। इस प्रकार भुवर्लोक भगवान के विराट स्वरूप में नाभि-स्थान पर है।
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