विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण दोनों भूलोक की मूल अवधारणा पर एकमत हैं परंतु अपने-अपने दृष्टिकोण से इसका वर्णन करते हैं। विष्णु पुराण अपनी संक्षिप्तता के बावजूद भूलोक के तात्विक अर्थ और भारतवर्ष के आध्यात्मिक महात्म्य (कर्मभूमि) पर सर्वाधिक बल देता है। इसमें सप्तद्वीपों और सागरों के विस्तार का वर्णन तो है किन्तु इसका मूल संदेश यह है कि भौगोलिक विस्तार अंततः आत्मा के कल्याण (अपवर्ग) के लिए ही रचित है और भगवान विष्णु ही समस्त लोकों के एकमात्र आश्रय हैं। दूसरी ओर श्रीमद्भागवत पुराण भूलोक की भौगोलिक, खगोलीय और गणितीय संरचना (योजनों में सटीक माप) का सबसे विशद वर्णन प्रस्तुत करता है। यह भगवान की विराट माया और उनके विश्वरूप को भूगोल के माध्यम से समझाने का प्रयास करता है। भागवत में राजाओं की वंशावली, द्वीपों के शासकों, उनके पुत्रों और वहाँ पूजे जाने वाले भगवान के विशिष्ट अवतारों का अत्यंत सूक्ष्मतम विवरण प्राप्त होता है। मार्कण्डेय पुराण भौगोलिक संरचना के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य, पर्वतों की श्रृंखलाओं और देवनदी गंगा के अवतरण की चार धाराओं का अत्यंत विस्तृत वर्णन करता है जबकि गरुड़ पुराण इस भूलोक को पूर्णतः मृत्यु, कर्मफल और पुनर्जन्म के परिप्रेक्ष्य में देखता है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक


