विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण दोनों भुवर्लोक की मूल अवधारणा पर एकमत हैं परंतु अपने-अपने दृष्टिकोण से इसका वर्णन करते हैं। विष्णु पुराण ब्रह्मांड की खगोलीय और गणितीय संरचना पर अधिक बल देता है। इसमें भुवर्लोक को मुख्य रूप से सूर्य और पृथ्वी के बीच के योजन-विस्तार के रूप में परिभाषित किया गया है। महर्षि पराशर का यह कथन कि भुवर्लोक का क्षैतिज विस्तार पृथ्वी के ठीक बराबर है ब्रह्मांड की एक बेलनाकार संरचना की ओर संकेत करता है। दूसरी ओर श्रीमद्भागवत पुराण सबसे अधिक विस्तृत भौगोलिक और निवासियों का विवरण प्रस्तुत करता है। भागवत (५.२४) में सूक्ष्म वर्णन है कि अंतरिक्ष कहाँ तक है, राहु कहाँ है, सिद्ध और विद्याधर कहाँ रहते हैं। यह पुराण इस लोक को भगवान के विश्वरूप के एक अंग (नाभि) के रूप में देखकर भक्ति और वैराग्य के दृष्टिकोण से इसका मूल्यांकन करता है।
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