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विष्णु उपासना⏱ 2 मिनट पठन

विष्णु जी और शेषनाग का क्या संबंध है?

शेषनाग भगवान विष्णु के परम भक्त और शय्या हैं।

संक्षिप्त उत्तर

शेषनाग भगवान विष्णु के परम भक्त और शय्या हैं। वे क्षीरसागर में अपने सहस्र फणों से आसन बनाते हैं जिस पर विष्णु जी योगनिद्रा में विराजते हैं। वे पृथ्वी को धारण करते हैं और रामावतार में लक्ष्मण, कृष्णावतार में बलराम के रूप में अवतरित हुए।

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विस्तृत उत्तर

भगवान विष्णु और शेषनाग का सम्बन्ध अत्यंत गहरा और पवित्र है जिसका विस्तृत वर्णन पुराणों में मिलता है। शेषनाग को 'अनन्त' भी कहते हैं क्योंकि वे अनन्त हैं — उनका कोई अन्त नहीं। वे नागों के राजा और भगवान विष्णु के परम भक्त हैं।

शेषनाग विष्णु जी की शय्या हैं — वे क्षीरसागर में अपने सहस्र फणों (हजार मस्तकों) को फैलाकर आसन बनाते हैं और उस पर भगवान विष्णु योगनिद्रा में विराजते हैं। भगवान विष्णु के इस रूप को 'शेषशायी' या 'पद्मनाभ' (नाभि से कमल उत्पन्न करने वाले) कहते हैं। उनकी इस शय्या पर उनके चरणों में माँ लक्ष्मी सेवा करती हैं और नाभि-कमल से ब्रह्मा जी प्रकट होते हैं।

शेषनाग को विष्णु जी का छत्र, आसन और परम सेवक माना गया है। पुराणों में वर्णन है कि वे समस्त पृथ्वी को अपने फणों पर धारण करते हैं — इसीलिए उन्हें 'धरणीधर' भी कहते हैं। शेषनाग का विष्णु जी के प्रति भक्ति-भाव का एक उदाहरण यह भी है कि जब-जब विष्णु जी ने अवतार लिया, शेषनाग भी उनके साथ अवतरित हुए — रामावतार में वे लक्ष्मण के रूप में और कृष्णावतार में वे बलराम के रूप में प्रकट हुए।

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