विस्तृत उत्तर
भागवत पुराण में स्वर्लोक की अनित्यता का संदेश अत्यंत स्पष्ट और गहन है। भागवत पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि अद्वैत वेदांत और शुद्ध भक्ति के मार्ग पर चलने वाले साधक स्वर्लोक की कामना नहीं करते क्योंकि उनका लक्ष्य जन्म-मृत्यु के चक्र को हमेशा के लिए तोड़ना होता है। स्वर्लोक भौतिक ब्रह्मांड के भीतर एक अस्थायी विश्राम स्थल है जहाँ आत्मा अपने अच्छे कर्मों का फल भोगने के लिए रुकती है। यह मोक्ष का अंतिम गंतव्य नहीं है। भगवद्गीता (9.21) का 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' और गीता (15.6) का 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' भागवत के इसी दृष्टिकोण को पुष्ट करता है। ब्रह्मज्ञानी और अनन्य भक्त इस स्वर्गिक सुख को भी 'नरक' के समान अस्थायी मानते हैं क्योंकि यहाँ से पतन निश्चित है। विष्णु पुराण में पराशर मुनि भी कहते हैं कि स्वर्ग में भी पतन का निरंतर भय बना रहता है।
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