संजय को दिव्य दृष्टि महर्षि वेदव्यास ने दी थी ताकि वे कुरुक्षेत्र का युद्ध हस्तिनापुर में बैठे धृतराष्ट्र को सुना सकें। धृतराष्ट्र ने स्वयं दिव्य दृष्टि लेने से यह कहकर मना किया था कि वे अपने स्वजनों को लड़ते नहीं देख सकते।
भीष्म पितामह को उनके पिता शांतनु से इच्छामृत्यु का वरदान था इसलिए बाणों की शैया पर 58 दिन पड़े रहने पर भी वे जीवित रहे। वे उत्तरायण की प्रतीक्षा में थे क्योंकि शास्त्रों में उत्तरायण में मृत्यु को मोक्षदायी माना जाता है। मकर संक्रांति पर उन्होंने स्वेच्छा से प्राण त्यागे।
भीष्म पितामह ने कुरु वंश के लिए धृतराष्ट्र का विवाह गांधार राजकुमारी गांधारी से कराया। गांधारी को पहले नहीं बताया गया था कि धृतराष्ट्र अंधे हैं। जब पता चला तो उन्होंने पतिव्रत-धर्म में आँखों पर पट्टी बाँध ली।
यक्ष-युधिष्ठिर संवाद वनपर्व का एक दार्शनिक प्रसंग है जिसमें यक्ष ने युधिष्ठिर से जीवन, धर्म और आश्चर्य पर प्रश्न पूछे। युधिष्ठिर ने सभी उत्तर दिए और चारों मूर्छित भाइयों को जीवित कराया। वह यक्ष वास्तव में यमराज थे।
महाभारत में कुल 18 पर्व हैं। आदि, सभा, वन, विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक, स्त्री, शांति, अनुशासन, अश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक और स्वर्गारोहण पर्व। 18 की संख्या महाभारत के हर पक्ष में दिखती है।
कुरुक्षेत्र युद्ध 18 दिन चला। पहले 10 दिन भीष्म, फिर 5 दिन द्रोण, 2 दिन कर्ण और अंतिम दिन शल्य सेनापति रहे। 18वें दिन दुर्योधन की मृत्यु के साथ युद्ध समाप्त हुआ और पांडवों की विजय हुई।
एकलव्य ने प्रत्यक्ष गुरु से नहीं, बल्कि वन में द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उन्हें मन ही मन गुरु मानकर स्वयं धनुर्विद्या सीखी। द्रोण ने बाद में गुरुदक्षिणा में उसका दायाँ अंगूठा माँगा जो एकलव्य ने बिना हिचक दे दिया।
युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने कुछ वर्ष राज किया, फिर परीक्षित को राज्य सौंपकर पाँचों पांडव और द्रौपदी महाप्रस्थान पर निकले। यात्रा में एक-एक करके सभी गिरते गए। केवल युधिष्ठिर स्वर्गद्वार तक पहुँचे और सशरीर स्वर्ग में प्रवेश किया।
कर्ण की असली माँ कुंती थीं। कुंती ने दुर्वासा ऋषि से प्राप्त मंत्र की परीक्षा करते हुए सूर्यदेव का आह्वान किया जिससे कर्ण जन्मे। किशोरावस्था में अविवाहित होने के कारण लोक-लाज से उन्होंने कर्ण को नदी में बहा दिया। सारथी अधिरथ की पत्नी राधा ने उनका पालन-पोषण किया।
तेरहवें दिन अर्जुन के दूर जाने पर द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह बनाया। अभिमन्यु व्यूह में घुसना जानते थे पर निकलना नहीं। अकेले छः परतें तोड़ने के बाद जयद्रथ ने शेष पांडवों को रोक दिया और कौरव महारथियों ने घेरकर अधर्मपूर्वक अभिमन्यु का वध किया।
महाभारत में कौरव पक्ष के पास 11 अक्षौहिणी और पांडव पक्ष के पास 7 अक्षौहिणी सेना थी। कुल 18 अक्षौहिणी — जो लाखों योद्धाओं के बराबर थी। 18 दिन के युद्ध के बाद दोनों पक्षों से मिलाकर केवल 18 के आसपास योद्धा जीवित बचे।
अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ में पल रहे परीक्षित की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने सूक्ष्म रूप धारण करके गर्भ में प्रवेश किया और अपनी दिव्य शक्ति से ब्रह्मास्त्र के प्रहार को निष्फल किया। परीक्षित मृत जन्मे, पर कृष्ण ने उन्हें पुनर्जीवित किया।
पांडवों ने अपना एक वर्ष का अज्ञातवास राजस्थान स्थित मत्स्य देश की राजधानी विराट नगर (आधुनिक बैराठ) में राजा विराट के यहाँ भिन्न-भिन्न छद्मवेश धारण करके बिताया।
विदुर हस्तिनापुर के महामंत्री, धृतराष्ट्र और पांडु के भाई तथा यमराज के अवतार माने जाते हैं। दासी-पुत्र होने के बावजूद वे अपने नैतिक बल, ज्ञान और सत्यनिष्ठा से महाभारत के सबसे आदरणीय पात्र बने। उन्होंने सदैव धर्म और पांडवों का साथ दिया।
कुरुक्षेत्र में युद्ध से पहले अर्जुन अपने स्वजनों को देखकर मोह और शोक में डूब गए और युद्ध करने से इनकार कर बैठे। उनके इस अज्ञानजनित मोह को दूर करने और धर्म के सही स्वरूप को समझाने के लिए श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया।
शकुनि की चाल में फँसे युधिष्ठिर ने सब कुछ हारने के बाद द्रौपदी को दाँव पर इसलिए लगाया क्योंकि शकुनि ने लालच दिया कि यदि वे जीते तो अपने सभी भाई और स्वयं को वापस पा लेंगे। यह उनकी महान भूल थी जो महाभारत के युद्ध का कारण बनी।
द्रौपदी का स्वयंवर राजा द्रुपद ने इसलिए रखा क्योंकि वे चाहते थे कि अर्जुन उनकी पुत्री से विवाह करे, जिससे द्रोणाचार्य को पराजित करने की शक्ति उन्हें मिल सके। स्वयंवर की शर्त जानबूझकर ऐसी रखी गई जो केवल अर्जुन जैसा धनुर्धर ही पूरा कर सके।
गांडीव धनुष मूलतः वरुणदेव के पास था जिसे उन्होंने अग्निदेव को दिया। खांडव वन दाह के समय अग्निदेव ने अर्जुन को यह दिव्य धनुष और अक्षय तरकश प्रदान किया। इसीलिए अर्जुन 'गांडीवधारी' कहलाए।
कुंती ने अविवाहित अवस्था में सूर्यदेव के वरदान से कर्ण को जन्म दिया था। उस युग में अविवाहित माँ का होना घोर सामाजिक अपमान था। लोक-लाज और परिवार की मर्यादा के भय से उन्होंने उस नवजात को नदी में बहा दिया।
द्रौपदी के पाँच पुत्र थे — युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, भीम से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकर्मा, नकुल से शतानीक और सहदेव से श्रुतसेन। इन्हें उपापांडव कहा जाता है। युद्ध की अंतिम रात अश्वत्थामा ने इन सभी को सोते समय मार दिया।
गांधारी ने विवाह के बाद जब जाना कि उनके पति धृतराष्ट्र नेत्रहीन हैं, तब पतिव्रत-धर्म की भावना से अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली — 'जब पति संसार नहीं देख सकते तो मुझे क्या अधिकार।' यह भारतीय साहित्य में आत्मत्याग का अनुपम उदाहरण है।