विस्तृत उत्तर
महाभारत युद्ध की विजय के बाद भी पांडवों का जीवन सुख से नहीं बीता। अपने स्वजनों, गुरुओं और लाखों वीरों की मृत्यु का बोझ उनके हृदय पर सदैव था।
युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का राजसिंहासन संभाला। कुछ वर्षों तक धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती उनके साथ महल में रहीं, फिर वनवास ले गईं जहाँ दावानल में उनका निधन हुआ। श्रीकृष्ण के स्वर्गधाम गमन के बाद यदुवंश का गांधारी के शाप से विनाश हुआ। यह समाचार सुनकर अर्जुन ने महसूस किया कि अब उनके उद्देश्य की पूर्ति हो गई है।
युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का राज्य अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित को सौंपा। इसके बाद पाँचों पांडव द्रौपदी सहित उत्तर दिशा में हिमालय की ओर महाप्रस्थान (अंतिम यात्रा) पर निकले। उनके साथ एक कुत्ता भी चलने लगा।
यात्रा में एक-एक करके सभी गिरते गए — पहले द्रौपदी (अर्जुन पर अधिक प्रेम के कारण), फिर सहदेव (अपनी बुद्धि पर गर्व के कारण), नकुल (अपने सौंदर्य पर अभिमान के कारण), अर्जुन (स्वयं को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर मानने के कारण) और भीम (बहुत खाने के कारण)। केवल युधिष्ठिर और वह कुत्ता स्वर्गद्वार तक पहुँचे।
इंद्र ने कुत्ते को स्वर्ग ले जाने से मना किया परंतु युधिष्ठिर ने कहा — 'जो मेरे साथ इतनी दूर चला, उसे छोड़कर स्वर्ग नहीं जाऊँगा।' तब वह कुत्ता स्वयं धर्मराज यमराज के रूप में प्रकट हुए। युधिष्ठिर इस परीक्षा में उत्तीर्ण हुए और सशरीर स्वर्ग गए जहाँ उन्होंने अपने सभी भाइयों और स्वजनों को दिव्य स्वरूप में देखा।





