विस्तृत उत्तर
द्युत सभा में द्रौपदी को दाँव पर लगाने की घटना महाभारत की सबसे करुण और विवादास्पद घटनाओं में से एक है।
शकुनि ने कूटनीतिपूर्वक युधिष्ठिर को जुए की चुनौती दी। युधिष्ठिर जानते थे कि यह खेल उचित नहीं है और दाँव एक के बाद एक चाल-चाल कर खेला जा रहा है, फिर भी वे रुक नहीं सके क्योंकि धर्म के नियमानुसार एक क्षत्रिय जुए की चुनौती को ठुकरा नहीं सकता था।
शकुनि के जादुई पासे थे जो उसकी इच्छानुसार चलते थे। धीरे-धीरे युधिष्ठिर ने अपना राज्य, संपदा, सेना, चारों भाई और अंत में स्वयं को भी दाँव पर लगाकर हार दिया। इसके बाद शकुनि ने कहा — एक और वस्तु बची है जो तुमने नहीं हारी — अपनी पत्नी द्रौपदी को दाँव पर लगाओ, तो तुम अपने आपको भी छुड़ा सकते हो।
जुए के नशे में, निर्णय शक्ति क्षीण होने के कारण, युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी दाँव पर लगा दिया — और हार गए। यह उनकी महान भूल थी।
द्रौपदी ने सभा में प्रश्न उठाया — जो पहले स्वयं को हार चुके हैं, उन्हें किसी और को दाँव पर लगाने का अधिकार है या नहीं? यह प्रश्न सभा में मौन और असमंजस का कारण बना। भीष्म, द्रोण और विदुर जैसे महारथी भी धर्मसंकट में पड़ गए। दुर्योधन ने इसका लाभ उठाकर द्रौपदी का अपमान करवाया। इस अपमान ने महाभारत के महायुद्ध की नींव रखी।