विस्तृत उत्तर
अश्वत्थामा के माथे की मणि निकाले जाने की कथा न्याय, दंड और करुणा का अद्भुत संगम है।
पृष्ठभूमि — महाभारत युद्ध के अंत में अश्वत्थामा ने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए रात को पांडव-शिविर में घुसकर द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी। उसने गर्भवती उत्तरा के गर्भ पर भी ब्रह्मशिरास्त्र चलाया।
द्रौपदी का निर्णय — जब बंधे हुए अश्वत्थामा को द्रौपदी के सामने लाया गया, अर्जुन ने उसे मारना चाहा। द्रौपदी ने कहा — 'यह गुरुपुत्र है, ब्राह्मण है। इसे मत मारो।' परंतु उसने सुझाया — 'इसकी शक्ति का स्रोत उसके माथे की मणि है — वह निकाल लो।'
यह मणि जन्म से भगवान शिव की कृपा से अश्वत्थामा के माथे में थी जो उसे दैत्य, दानव, अस्त्र, व्याधि, भूख, प्यास — सब से सुरक्षित रखती थी।
श्रीकृष्ण ने माथे से मणि निकाली और श्राप दिया — 'जिस प्रकार तूने द्रौपदी को जीवनभर का घाव दिया, तू भी इस घाव के साथ अनंत काल तक भटकेगा।' माथे का घाव कभी नहीं भरा — यही उसकी पहचान और दंड बन गया।





