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अश्वत्थामा के माथे की मणि क्यों निकाली गई?

अश्वत्थामा के माथे की मणि निकाले जाने की कथा न्याय, दंड और करुणा का अद्भुत संगम है।

संक्षिप्त उत्तर

द्रौपदी के पाँचों पुत्रों और उत्तरा के गर्भ पर हमले की सजा के रूप में अर्जुन ने मणि निकाली और कृष्ण ने श्राप दिया — उस घाव के साथ अनंत काल भटकना। मणि द्रौपदी के सुझाव पर ली गई।

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विस्तृत उत्तर

अश्वत्थामा के माथे की मणि निकाले जाने की कथा न्याय, दंड और करुणा का अद्भुत संगम है।

पृष्ठभूमि — महाभारत युद्ध के अंत में अश्वत्थामा ने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए रात को पांडव-शिविर में घुसकर द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी। उसने गर्भवती उत्तरा के गर्भ पर भी ब्रह्मशिरास्त्र चलाया।

द्रौपदी का निर्णय — जब बंधे हुए अश्वत्थामा को द्रौपदी के सामने लाया गया, अर्जुन ने उसे मारना चाहा। द्रौपदी ने कहा — 'यह गुरुपुत्र है, ब्राह्मण है। इसे मत मारो।' परंतु उसने सुझाया — 'इसकी शक्ति का स्रोत उसके माथे की मणि है — वह निकाल लो।'

यह मणि जन्म से भगवान शिव की कृपा से अश्वत्थामा के माथे में थी जो उसे दैत्य, दानव, अस्त्र, व्याधि, भूख, प्यास — सब से सुरक्षित रखती थी।

श्रीकृष्ण ने माथे से मणि निकाली और श्राप दिया — 'जिस प्रकार तूने द्रौपदी को जीवनभर का घाव दिया, तू भी इस घाव के साथ अनंत काल तक भटकेगा।' माथे का घाव कभी नहीं भरा — यही उसकी पहचान और दंड बन गया।

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