विस्तृत उत्तर
कर्ण का कवच-कुंडल उनके पिता सूर्यदेव ने दिया था — या अधिक सटीक रूप से कहें तो यह स्वयं जन्म के साथ ही उनके शरीर पर था।
वाल्मीकि महाभारत की एक कथा के अनुसार, जब सूर्यदेव कुंती के आह्वान पर प्रकट हुए और उन्होंने पुत्र देने का वचन दिया, तब उन्होंने कहा — 'तुम्हारा पुत्र माता अदिति के दिए दिव्य कुंडलों और कवच को लेकर पैदा होगा। उसका कवच किसी भी अस्त्र से नहीं टूटेगा।'
यहाँ माता अदिति का उल्लेख महत्वपूर्ण है — देवमाता अदिति के दिव्य कुंडलों को यह कवच विशेष रूप से दिव्य और अभेद्य बनाता था। सूर्यदेव ने इन दोनों को अपने पुत्र को जन्म के साथ वरदान स्वरूप दिए।
पूर्वजन्म के प्रसंग में — दुरदुम्भ (सहस्रकवच) राक्षस को सूर्यदेव ने वरदान में 100 कवच और दिव्य कुंडल दिए थे। नर-नारायण ने 99 कवच तोड़े, एक बचा जो द्वापर में कर्ण के साथ आया।
इस कवच-कुंडल की विशेषता यह थी कि जब तक यह कर्ण के शरीर पर था, कर्ण अजेय थे — इसीलिए इंद्र देव को छल से इसे लेना पड़ा।




