विस्तृत उत्तर
कर्ण के धनुष का नाम 'विजय' था। यह महाभारत के सबसे शक्तिशाली और रहस्यमय दिव्य धनुषों में से एक था।
विजय धनुष का इतिहास — इसे विश्वकर्मा ने त्रिपुरासुर के विनाश के लिए बनाया था और भगवान शिव ने इसी से पाशुपतास्त्र चलाकर त्रिपुर-संहार किया था। शिव ने इसे देवराज इंद्र को दिया, और इंद्र ने परशुराम को। परशुराम ने अपने प्रिय शिष्य कर्ण को यह दिया।
विजय धनुष की विशेषताएं — किसी भी अस्त्र या शस्त्र से यह खंडित नहीं हो सकता था। इससे बाण छूटते ही भयानक ध्वनि उत्पन्न होती थी। यह धनुष जिसके हाथ में होता था उसके चारों ओर एक अभेद्य घेरा बन जाता था — यहाँ तक कि पाशुपतास्त्र भी उसे भेद नहीं सकता था।
महाभारत में — कुरुक्षेत्र के 17वें दिन कर्ण-अर्जुन के महायुद्ध में कर्ण ने विजय धनुष से अर्जुन से युद्ध किया था। जब कर्ण का रथ-चक्र धँस गया और वह नीचे उतरा, उस समय उसके हाथ में विजय नहीं था — तभी अर्जुन ने उसे परास्त किया।





