विस्तृत उत्तर
नारायणास्त्र का प्रतिकार अत्यंत अनोखा और दार्शनिक है — यह किसी अस्त्र से नहीं, बल्कि समर्पण और निहत्थेपन से होता है।
भारतकोश और महाभारत के अनुसार — 'नारायणास्त्र का कोई प्रतिकार नहीं है। इसका एकमात्र उपाय यह है कि शत्रु अपने अस्त्र छोड़कर नम्रतापूर्वक इसके सामने आत्मसमर्पण कर दे।'
यह अस्त्र केवल उन लोगों को प्रभावित करता था जो हथियार उठाए हों या युद्ध का विचार मन में रखते हों। जो व्यक्ति निहत्था होकर, मन में युद्ध का विचार त्यागकर, हाथ जोड़कर इसके सामने खड़ा हो जाए — वह इससे बच जाता था।
महाभारत का प्रसंग — जब अश्वत्थामा ने नारायणास्त्र छोड़ा तो आकाश से लाखों प्रकार के अस्त्र-शस्त्र उत्पन्न होकर पांडव सेना पर टूट पड़े। जिसने भी प्रतिरोध किया वह नष्ट हुआ। भीम ने प्रतिकार करने की कोशिश की — विफल हुए। श्रीकृष्ण ने सबको शस्त्र छोड़ने और आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया। जब सभी ने ऐसा किया, नारायणास्त्र शांत हो गया।





