विस्तृत उत्तर
महाभारत में नारायणास्त्र अश्वत्थामा ने चलाया था — और यह इस महाकाव्य का एक अत्यंत भयावह प्रसंग है।
यह घटना द्रोणपर्व में है। जब अश्वत्थामा को पता चला कि पांडवों ने उसके पिता द्रोणाचार्य को छल से मारा है, तो वह क्रोध से विक्षिप्त हो गया। पांडव सेना को नष्ट करने के लिए उसने अपने पिता का दिया हुआ वह दुर्लभ और अजेय अस्त्र चलाया — नारायणास्त्र।
नारायणास्त्र कैसे मिला था — द्रोणाचार्य ने भगवान नारायण (विष्णु) की उपासना करके यह अस्त्र प्राप्त किया था। उन्होंने इसे अश्वत्थामा को दिया था यह जानते हुए कि वह अपने उचित समय पर इसका प्रयोग करेगा।
प्रभाव — जैसे ही अश्वत्थामा ने यह अस्त्र छोड़ा, आकाश से चक्र, त्रिशूल, गदा, बाण, खड्ग — लाखों प्रकार के अस्त्र उत्पन्न होकर पांडव सेना पर टूट पड़े। एकादश रुद्र भी प्रकट हुए। जो योद्धा प्रतिरोध करता, वह नष्ट हो जाता। तब श्रीकृष्ण के निर्देशन में पांडव सेना ने आत्मसमर्पण किया और बच गई।
विशेष — नारायणास्त्र एक युद्ध में केवल एक बार चलाया जा सकता था। दूसरी बार चलाने पर यह स्वयं चलाने वाले को नष्ट करता है।





