विस्तृत उत्तर
भीष्म पितामह की मृत्यु किसी एक दिव्यास्त्र से नहीं, बल्कि अर्जुन के साधारण बाणों की अनवरत वर्षा से हुई — और यह भी उनकी इच्छामृत्यु थी।
कथा इस प्रकार है — भीष्म की प्रतिज्ञा थी कि वे किसी स्त्री या नपुंसक व्यक्ति पर शस्त्र नहीं उठाएंगे। इसलिए पांडवों ने शिखंडी को उनके सामने रखा। शिखंडी पूर्वजन्म में अंबा था और अब स्त्री से पुरुष बना था। भीष्म ने शिखंडी को पहचाना और उस पर बाण चलाना अस्वीकार कर दिया — वे निहत्थे खड़े रहे।
इस अवसर का उपयोग करते हुए अर्जुन शिखंडी के पीछे खड़े होकर भीष्म पर बाणों की वर्षा करते रहे। भीष्म शिखंडी के बाण तो आसानी से काट देते थे, परंतु अर्जुन के तीर उनके शरीर को छेदते रहे। इस प्रकार भीष्म बाणों की शरशय्या पर गिर गए।
किंतु इच्छामृत्यु के वरदान के कारण भीष्म ने प्राण नहीं त्यागे — वे 58 दिनों तक उत्तरायण की प्रतीक्षा में शरशय्या पर लेटे रहे। उत्तरायण आने पर उन्होंने स्वेच्छा से प्राण त्यागे।





