विस्तृत उत्तर
पुराणों और महाभारत में ब्रह्मशिरास्त्र को ब्रह्मास्त्र से चार गुना अधिक शक्तिशाली बताया गया है।
यह अंतर इसके प्रतीकात्मक स्वरूप में निहित है — सामान्य ब्रह्मास्त्र ब्रह्माजी के एक मुख की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि ब्रह्मशिरास्त्र उनके चारों मुखों (चतुर्मुख ब्रह्मा) की सम्मिलित शक्ति का प्रतीक है।
ब्रह्मशिरास्त्र के प्रभाव — यदि यह किसी पर चलाया जाए तो उसका विनाश निश्चित है। जहाँ यह चले वहाँ हजारों वर्षों तक जीवन नहीं होगा। यदि दो ब्रह्मशिरास्त्र आपस में टकराएं तो पूरे ब्रह्मांड का नाश हो सकता है।
महाभारत में उल्लेख — सौप्तिकपर्व में जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र और ब्रह्मशिरास्त्र का प्रयोग किया, तब इन दोनों के प्रभाव का स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। अर्जुन के प्रति इसका वर्णन इस प्रकार है — इसके छूटते ही तीनों लोकों में कोहराम मच गया, सूर्य और चंद्रमा की कांति फीकी पड़ गई, और समस्त प्राणी भय से काँपने लगे।





