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पढ़िए "अरण्यकाण्ड" का प्रथम संस्करण: जब एक तिनका बना ब्रह्मास्त्र—क्या हुआ जब देवराज इन्द्र के पुत्र ने लिया श्रीराम से बैर?
राम

पढ़िए "अरण्यकाण्ड" का प्रथम संस्करण: जब एक तिनका बना ब्रह्मास्त्र—क्या हुआ जब देवराज इन्द्र के पुत्र ने लिया श्रीराम से बैर?

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चित्रकूट छोड़कर वन यात्रा का आरंभ

चित्रकूट छोड़कर वन यात्रा का आरंभ

अयोध्याकाण्ड के अंत में भरत मिलाप के बाद कुछ समय चित्रकूट में बिताकर श्रीराम, जानकीजी और लक्ष्मणजी आगे वन की ओर प्रस्थान करते हैं। अरण्यकाण्ड में उनके दण्डकारण्य (दंडक वन) के भ्रमण और विभिन्न ऋषि-मुनियों एवं घटनाओं का वर्णन है। वन का वातावरण अब गहरा और बीहड़ होता जा रहा है। जंगल में तरह-तरह के वृक्ष, लताएँ और पुष्प खिले हैं। राम-लक्ष्मण छाया ढूँढते, वन फल-मूल संग्रह करते और रास्ते में आने वाले आश्रमों में ऋषियों से मिलते जाते हैं। वन की नीरव शांति में कभी पशु-पक्षियों के स्वर गूंजते हैं तो कहीं दूर राक्षसों के उत्पात की सूचना मिलती है। ऐसे ही सुरम्य वन में एक दिन प्रभु श्रीराम और सीताजी किसी शिला पर विश्राम करते हैं, जहाँ एक मधुर पारिवारिक प्रसंग घटित होता है।

फूलों के गहने और दम्पति का स्नेह

वन में रहते हुए भी श्रीराम सीता जी का हर प्रकार से ध्यान रखते हैं। एक बार प्रभु राम ने सुंदर वनफूल इकट्ठे किए और अपने करकमलों से उन्हीं फूलों के सुन्दर भूषण (गहने) बनाए। बड़े प्रेम से उन्होंने वे फूलों के आभूषण जानकीजी को पहनाए

एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥

इन पंक्तियों में चित्रण है कि एक अवसर पर राम ने मनोहर फूल चुनकर स्वहस्त से तरह-तरह के अलंकार बनाए और आदरपूर्वक अपनी प्रियतमा सीता को पहनाए। फिर दोनों एक सुंदर स्फटिक की शिला पर बैठ गए। यह दृश्य वनवास के कष्टों के बीच भी श्रीराम-सीता के आपसी प्रेम और आनंद को दर्शाता है। सरल वेशभूषा और परिस्थितियों में भी राम सीता को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं।

सीताजी भी इन फूलों के आभूषणों से बहुत प्रसन्न होती हैं। पर्णकुटी का सादा जीवन होते हुए भी राम-जानकी एक-दूसरे में अपार संतोष एवं सुख पाते हैं।

जब राम-सीता उस शिला पर विराजमान थे, देवराज इन्द्र के पुत्र जयंत ने दूर से यह दृष्य देखा। उसे अहंकार हुआ और मन में एक कुत्सित जिज्ञासा जगी – “देखें तो सही राम की शक्ति कितनी है!” जयंत ने कौए का रूप धर लिया, क्योंकि कौआ बड़ा चालाक और तेज उड़ान वाला पक्षी है। तुलसीदासजी लिखते हैं:

सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥

इन्द्रपुत्र जयंत की उद्दंडता और दंड

व्याख्या: इन्द्र का पुत्र जयंत एक कौए (बायस) का वेष धरकर आ गया और कपटी बुद्धि से श्रीरघुनाथजी की शक्ति की परीक्षा लेना चाहा। यह उसकी महामूर्खता थी, जैसे कोई छोटी चींटी सागर का नाप लेना चाहे – उसी प्रकार उस मंदबुद्धि ने महान प्रभु के बल को परखने की चेष्टा की।

जयंत रूपी उस कौए ने मौका देखकर सीताजी के चरण में तीव्रता से अपनी नुकीली चोंच मारी और तुरंत उड़ गया। सीताजी के पैर से रक्त की धार बह निकली और वे व्याकुल हो उठीं। भगवान श्रीराम इस अनर्थ को तुरंत समझ गए। उनके करुण हृदय को क्रोध और चिंता ने एक साथ घेरा – कौन दुष्ट ऐसा दुस्साहस कर गया? राम ने तुरंत समीप पड़े कुश (या सरकंडे) को उठाकर धनुष पर बाण के रूप में चढ़ा लिया।

सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा॥
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥

भावार्थ: वह मूर्ख कौआ सीता के पैर में चोंच मारकर भाग गया। जब चरण से रक्त बहने लगा, तब श्री रघुनाथजी समझ गए (कि किसी ने चोट पहुँचाई है) और उन्होंने तुरंत कुश की एक तीली को बाण बनाकर धनुष पर चढ़ा लिया।

राम ने ब्रह्मास्त्र के समान शक्ति उस तिनके में संचारित की और उसे उस कौए की ओर छोड़ दिया। अब जयंत की मुश्किल शुरू हुई – राम का छोड़ा हुआ अस्त्र अमोघ था, लौट नहीं सकता था।

ब्रह्मास्त्र का पीछा और देवताओं का असमर्थ होना

जैसे ही राम द्वारा संधान किया गया वह मंत्र-सिद्ध तिनका बाण जयंत (कौआ) के पीछे दौड़ा, जयंत घबरा कर प्राण बचाने को चारों ओर भागा। सबसे पहले वह अपने पिता इन्द्र के पास देवलोक पहुँचा और सहायता मांगी। परंतु इन्द्र ने यह जानकर कि मेरे पुत्र ने स्वयं श्रीराम से वैर लिया है, उसे अपने लोक में आश्रय नहीं दिया। भगवान से वैर करने वाले को भला कौन बचा सकता है? विवश होकर जयंत इन्द्रलोक से ब्रह्मलोक भागा, वहाँ ब्रह्माजी से गुहार की। ब्रह्मा जी ने भी असमर्थता जताई। वहाँ से शिवलोक गया, लेकिन शिवजी के गणों ने भी उसे दुत्कार दिया। हर जगह जयंत को निराशा ही मिली:

काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही॥
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥

इस चौपाई में एक टिप्पणी स्वरूप काकभुशुंडीजी (जो स्वयं रामभक्त कौए हैं) गरुड़जी को समझाते हैं – “हे गरुड़! जो श्रीराम का द्रोही (विरोधी) हो, उसे कहीं स्थान नहीं मिलता। उसके लिए माता भी मृत्यु के समान कठोर हो जाती है, पिता यमराज के समान निर्मम हो जाते हैं और अमृत भी विष के समान हो जाता है।” वास्तव में जयंत जहां भी गया, उसे अपमान और भय ही मिला। देवता, ऋषि, कोई भी भगवान राम के कोप से उसे बचाने को तैयार न था।

जयंत की शरणागति और श्रीराम की क्षमा

आकर जयंत ने तुरंत कौए का रूप त्याग दिया और अपने वास्तविक रूप (देव कुमार) में श्रीराम-सीता-लक्ष्मण के सामने प्रकट हुआ। वह गिड़गिड़ाकर प्रभु के चरणों में गिर पड़ा। जयंत रो-रोकर क्षमा मांगने लगा – “हे कोसलाधीश राम! मैंने आप की महिमा नहीं जानी, मूर्खतावश बहुत बड़ा अपराध कर बैठा हूँ। अब शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा करें। अपने कर्मों का फल मैं भोग चुका, अब दया कीजिए।”

भगवान राम का हृदय करुणा से भर गया। उनके स्वभाव में शरणागत की रक्षा सर्वोपरि है। तुलसीदासजी कहते हैं:

दीनबंदु श्रीराम की क्षमा और जयंत का प्रायश्चित

दीन बंदु दुख भंजना, प्रभु दयालु भगवंत।
सरन परे जे ताहिं रच्छ, तजि दुष्टन को दंत॥

अर्थात श्रीराम दीनबंधु और दयालु हैं। जो उनके शरण आ जाता है, उसकी वे रक्षा करते हैं और दुष्टों के अहंकार नष्ट कर देते हैं। जयंत पहले दुष्टता कर रहा था, पर अब वह शरणागत हो गया, इसलिए राम का कोमल हृदय उसे दंडित करने के बजाय क्षमा करने को तैयार हुआ।

प्रभु राम ने ब्रह्मबाण को निष्फल नहीं किया – वह वापस नहीं लौट सकता था – अतः नियम पालन हेतु उन्होंने जयंत की एक आँख को लक्ष्य करा दिया। देखते-ही-देखते उस दिव्य अस्त्र ने जयंत की एक आंख को क्षत कर दिया, वह सदा के लिए काणे (कानी आँख वाले) हो गए। परंतु उनका जीवन बच गया। भगवान ने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें क्षमा कर दिया:

सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥

भावार्थ: (शिवजी पार्वती से कहते हैं -) हे भवानी! करुणानिधान श्रीराम ने उसकी अत्यंत दुःखभरी वाणी सुनकर (उसे दंडस्वरूप) एक नेत्र का काना करके छोड़ दिया।

जयंत ने प्रभु के चरण पकड़कर कृतज्ञता प्रकट की। प्रभु राम ने उसे आशीर्वाद दिया और उचित मर्यादा सिखाते हुए समझाया कि आगे से कभी अहंकार में आकर परमात्मा की शक्ति को चुनौती देने की चेष्टा न करे। एक नेत्र गंवाकर भी जीवन दान पाकर जयंत की बुद्धि ठिकाने आ गई थी। उसने बार-बार प्रभु को प्रणाम किया, उनके गुणगान किए और वहाँ से विदा हो गया।

इस प्रसंग के बाद श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण पंचवटी की ओर अपने वनवास के अगले चरण पर आगे बढ़ेंगे। मार्ग में वे अनेक ऋषि-मुनियों से मिलेंगे और उनका आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। आगे की कथा पढ़ने के लिए आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

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