विस्तृत उत्तर
महारथी कर्ण महाभारत के सर्वाधिक शक्तिशाली योद्धाओं में थे और उनके पास अनेक दुर्लभ दिव्य अस्त्र थे।
विजय धनुष — गुरु परशुराम द्वारा प्रदत्त। यह अखंड, अभेद्य और किसी भी अस्त्र-शस्त्र से नष्ट न होने वाला धनुष था। जब तक यह कर्ण के हाथ में था, उसे जीतना असंभव था।
इंद्रास्त्र / अमोघास्त्र — देवराज इंद्र ने कवच-कुंडल लेने के बदले दिया। यह एक बार ही चलाया जा सकता था और अचूक प्रभाव डालता था। कर्ण ने इसे अर्जुन के लिए बचाकर रखा था, परंतु दुर्योधन के आग्रह पर घटोत्कच पर चलाया।
ब्रह्मास्त्र — परशुराम से सीखा। किंतु परशुराम के श्राप के कारण निर्णायक क्षण में मंत्र भूल गया।
इसके अतिरिक्त कर्ण के पास भार्गवास्त्र, नागास्त्र (अश्वसेन नाग — जिसे उसने अर्जुन पर चलाया), रुद्रास्त्र, गरुड़ास्त्र, नागपाश और अग्नेयास्त्र आदि अनेक दिव्यास्त्र थे। कर्ण स्वयं भी उत्कृष्ट धनुर्धर थे — शरीर पर जब तक जन्मजात कवच-कुंडल था, कोई अस्त्र उन्हें भेद नहीं सकता था।





