विस्तृत उत्तर
कर्ण का कवच-कुंडल महाभारत के सबसे चर्चित दिव्य रत्नों में से एक है।
कर्ण सूर्यदेव के पुत्र थे। जन्म के समय उनके शरीर पर एक दिव्य कवच और कानों में दिव्य कुंडल विद्यमान थे। यह कवच उनके शरीर का ही अंग था — यह बाहर से पहना हुआ नहीं था, बल्कि जन्म से शरीर के साथ एकाकार था। जैसे-जैसे कर्ण बड़े होते गए, कवच-कुंडल भी उनके साथ बढ़ते गए।
इस कवच की विशेषता थी — कोई भी दिव्यास्त्र, मनुष्यास्त्र या शस्त्र इसे भेद नहीं सकता था। जब तक यह कवच-कुंडल शरीर पर था, कर्ण वस्तुतः अजेय थे।
पूर्वजन्म संदर्भ — एक पौराणिक कथा के अनुसार कर्ण पूर्वजन्म में 'दुरदुम्भ' नामक राक्षस थे जिन्हें सूर्यदेव ने 100 कवच और दिव्य कुंडल का वरदान दिया था। नर-नारायण ने उसके 99 कवच तोड़े — एक कवच और कुंडल शेष बचे और वे ही द्वापर में कर्ण के साथ आए।
कवच-कुंडल देने का सूर्यदेव का वचन — 'तुम्हारा पुत्र माता अदिति के दिव्य कुंडलों और कवच को लेकर पैदा होगा। उसका कवच किसी भी अस्त्र से नहीं टूटेगा।'





