विस्तृत उत्तर
नारायणास्त्र और पाशुपतास्त्र दोनों त्रिदेवों के सर्वोच्च अस्त्र हैं — एक विष्णु का, दूसरा शिव का। इनकी तुलना करना पुराणों में भी गूढ़ विषय है।
नारायणास्त्र की विशेषता — इसका कोई प्रतिकार नहीं है। यह सर्वव्यापी है — कहीं भी हो, लक्ष्य को भेद देता है। इसके सामने आत्मसमर्पण ही एकमात्र उपाय है। एक युद्ध में केवल एक बार चलाया जा सकता है। यह भगवान विष्णु की समस्त शक्ति का प्रतीक है।
पाशुपतास्त्र की विशेषता — इसे मन, वाणी, नेत्र और धनुष — चारों से चलाया जा सकता है। तीनों लोकों में कोई नहीं बच सकता। पुराणों में कहा गया है कि पाशुपतास्त्र ब्रह्मास्त्र को निगल सकता है। भगवान शिव की संहारशक्ति का यह चरम प्रतीक है।
तुलना — दोनों को पराह पुराण में समकक्ष (पाशुपतास्त्र के समकक्ष एक अस्त्र है नारायणास्त्र — ऐसा उल्लेख है) बताया गया है। शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं — दोनों परब्रह्म के रूप हैं। इसलिए दोनों के अस्त्रों को समतुल्य मानना ही धार्मिक दृष्टि से उचित है।





