रविवार व्रत कथा: संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथा-प्रस्तुति
१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ
हिन्दू धर्म के व्रत-उपवास विधानों में भगवान सूर्यनारायण की उपासना का अत्यंत विशिष्ट और पावन स्थान है। रविवार का दिन साक्षात् प्रत्यक्ष देवता, त्रिलोकी के नेत्र और समस्त चराचर जगत को जीवन और ऊर्जा प्रदान करने वाले भगवान सूर्यदेव को समर्पित है। पारंपरिक व्रत-पुस्तिकाओं, लोक-प्रचलित प्रामाणिक पाठों और पौराणिक आख्यानों के अनुसार, रविवार व्रत की कथा का वाचन उस समय किया जाता है जब व्रती स्नान-ध्यान से पूर्णतः निवृत्त होकर, लाल वस्त्र धारण कर, रक्त चंदन, लाल पुष्प और अक्षत से भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर लेता है । यह कथा अत्यंत एकाग्रता, शुद्धता और भक्ति-भाव से सुनी जाती है। कथा-श्रवण के समय व्रती अपने हाथ में अक्षत (चावल के दाने) और पुष्प रखता है, जिन्हें कथा की समाप्ति पर भगवान सूर्यदेव के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक अर्पित कर दिया जाता है ।
पारंपरिक आख्यानों में इस कथा का आरंभ सर्वदा एक अत्यंत पवित्र और पौराणिक पृष्ठभूमि से होता है, जो श्रोताओं के मन में ईश्वरीय सत्ता के प्रति अगाध श्रद्धा और समर्पण का भाव जाग्रत करता है। यह प्रारंभिक प्रसंग नैमिषारण्य के पवित्र वन से आरंभ होता है, जहाँ अनेक ऋषि-मुनि लोक-कल्याण की भावना से एकत्रित हुए थे。
पारंपरिक आरंभिक प्रसंग एवं संवाद:
एक समय की बात है, परम पवित्र नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि अठासी हजार ऋषि-मुनि एकत्रित हुए। वह स्थान तपस्या, स्वाध्याय और ईश्वरीय विमर्श का केंद्र था। उस पावन सभा में व्यास-शिष्य, परम ज्ञानी और पुराणों के मर्मज्ञ सूत जी महाराज पधारे। सूत जी को आते देख सभी शौनकादि ऋषियों ने उठकर उन्हें ससम्मान प्रणाम किया और उन्हें उच्चासन पर आसीन कराया。
ऋषियों ने अत्यंत विनयपूर्वक हाथ जोड़कर सूत जी महाराज से प्रार्थना की, "हे महाभाग! हे अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाले सूत जी! कलियुग का प्रभाव अत्यंत भयंकर है। इस युग में मनुष्य अल्पायु, अल्पबुद्धि और अनेक प्रकार के पाप कर्मों में लिप्त रहने वाले होंगे। कलियुग के प्राणी नित्य-प्रति अनेक प्रकार के असाध्य रोगों, भयंकर दरिद्रता, पारिवारिक क्लेशों और घ घोर दुखों से घिरे रहेंगे। हे मुनिश्वर! मानव जाति पर कृपा करके आप हमें कोई ऐसा अत्यंत सरल, सुलभ और प्रभावकारी व्रत तथा उसकी कथा सुनाएं, जिसके श्रवण मात्र और विधिपूर्वक पालन से कलियुग के मनुष्यों के समस्त कष्ट दूर हों, उन्हें पूर्ण आरोग्य की प्राप्ति हो, उनकी दरिद्रता का समूल नाश हो और उनकी सर्व-मनोकामनाएं पूर्ण हों।"
शौनकादि ऋषियों का यह लोक-कल्याणकारी और करुणा से परिपूर्ण प्रश्न सुनकर सूत जी महाराज अत्यंत प्रसन्न हुए। सूत जी बोले, "हे मुनिश्वरों! आप सभी ने संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण के लिए अत्यंत उत्तम और श्रेष्ठ प्रश्न किया है। मैं आप सभी को साक्षात् प्रत्यक्ष देव, अंधकार के विनाशक भगवान सूर्यनारायण के 'रविवार व्रत' की वह परम पावन, गोपनीय और दुर्लभ कथा सुनाता हूँ, जो संपूर्ण पापों को भस्म करने वाली, दरिद्रता को हरने वाली, कुष्ठ आदि भयंकर रोगों का नाश करने वाली और सुख-संपत्ति, यश तथा कीर्ति प्रदान करने वाली है। इस कथा को सुनने से ही जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं। आप सब अपने मन को एकाग्र करके, पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ इस पावन कथा का श्रवण करें।"
| व्रत कथा के प्रमुख संस्करण | कथा का मुख्य पात्र | संकट/समस्या का स्वरूप | सूर्यदेव की कृपा का प्रतिफल |
|---|---|---|---|
| प्रथम संस्करण | धर्मपरायण वृद्धा एवं ईर्ष्यालु पड़ोसन | पड़ोसन द्वारा गोबर न देना, राजा द्वारा गाय का अपहरण | स्वर्ण का गोबर देने वाली दिव्य गाय, राजा को स्वप्न एवं भय |
| द्वितीय संस्करण | निर्धन ब्राह्मण एवं निःसंतान राजा | ब्राह्मण की घोर दरिद्रता, राजा का संतानहीन होना | ब्राह्मण को अपार धन-संपत्ति, राजा को तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति |
| तृतीय संस्करण (लोक-कथा) | तपसी और लपसी | तपसी के मन में लालच, व्रत के पुण्य का क्षय | कथा-श्रवण के अनिवार्य नियमों का प्रतिपादन एवं पुण्य-प्राप्ति |
२. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
रविवार व्रत की महिमा का गान करने वाली मुख्य रूप से तीन पारंपरिक कथाएं अत्यंत प्रचलित और प्रामाणिक मानी जाती हैं। पारंपरिक विधान और लोक-मान्यता के अनुसार, व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए व्रती को इन सभी कथाओं का श्रवण करना चाहिए। प्रत्येक कथा भगवान सूर्यदेव की असीम करुणा, उनके चमत्कारों और व्रत की महत्ता को भिन्न-भिन्न दृष्टांतों के माध्यम से प्रस्तुत करती है。
प्रथम संस्करण: वृद्धा, चमत्कारी गाय और राजा का प्रसंग
सूत जी महाराज बोले— हे ऋषियों! प्राचीन काल की बात है, किसी नगर में एक अत्यंत निर्धन परंतु परम धर्मपरायण और सात्विक विचारों वाली एक वृद्धा निवास करती थी। उस वृद्धा का जीवन यद्यपि अभावों से भरा हुआ था, परंतु उसके हृदय में भगवान सूर्यनारायण के प्रति अगाध श्रद्धा और अटूट भक्ति का वास था। वह वृद्धा नियमित रूप से रविवार का व्रत किया करती थी और उसने अपने जीवन में कभी भी इस व्रत का परित्याग नहीं किया था ।
उस वृद्धा का यह कठोर नियम था कि वह प्रत्येक रविवार को प्रातः काल सूर्योदय से बहुत पूर्व ही अपनी शय्या का त्याग कर देती थी। स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर, वह स्वच्छ और शुद्ध वस्त्र धारण करती थी। तत्पश्चात, भगवान सूर्यदेव के प्रति अपनी पवित्र भावना को प्रकट करने के लिए, वह संपूर्ण घर के आंगन को गाय के गोबर से लीपकर पूर्णतः शुद्ध और पवित्र करती थी । घर को भली-भांति पवित्र करने के उपरांत ही वह अल्पना बनाती और साक्षात् भगवान सूर्यनारायण की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती थी। वह उन्हें लाल पुष्प, रक्त चंदन और नैवेद्य अर्पित करती थी और व्रत का कठोरता से पालन करते हुए दिन में केवल एक बार बिना नमक का सात्विक भोजन ग्रहण करती थी ।
भगवान सूर्यनारायण की इस प्रकार निरंतर, निष्काम और अगाध उपासना के प्रभाव से उस वृद्धा के घर में धीरे-धीरे किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं रही। भगवान सूर्य की कृपा-दृष्टि उस पर ऐसी पड़ी कि उसका घर धन-धान्य, अन्न-वस्त्र और सुख-समृद्धि से परिपूर्ण हो गया । वह अत्यंत सुखपूर्वक, बिना किसी रोग और शोक के अपना जीवन व्यतीत करने लगी。
परंतु उस वृद्धा के पास अपनी कोई गाय नहीं थी। इसलिए वह अपने घर और आंगन को लीपने के लिए अपनी एक पड़ोसन की गाय का गोबर प्रतिदिन मांग कर लाया करती थी। जब उस पड़ोसन ने देखा कि यह निर्धन वृद्धा जो कल तक दाने-दाने को मोहताज थी, वह दिन-प्रतिदिन अत्यंत समृद्ध, सुखी और वैभवशाली होती जा रही है, तो उसके मन में भयंकर ईर्ष्या, द्वेष और जलन उत्पन्न हो गई । वह कुटिल और दुर्जन पड़ोसन मन ही मन उस धर्मनिष्ठ वृद्धा से जलने लगी。
एक दिन उस ईर्ष्यालु पड़ोसन ने विचार किया कि यह वृद्धा प्रतिदिन मेरी ही गाय का गोबर ले जाकर अपना घर लीपती है और सूर्यदेव की पूजा करती है, जिसके कारण यह इतनी धनी हो गई है। यदि मैं अपनी गाय का गोबर इसे देना ही बंद कर दूँ, तो यह अपने घर को पवित्र नहीं कर सकेगी। आंगन नहीं लिपेगा तो इसकी पूजा नहीं होगी, और पूजा न होने से इसका रविवार का व्रत भंग हो जाएगा। तब भगवान सूर्य इससे रुष्ट हो जाएंगे और यह पुनः दरिद्र हो जाएगी। इसी कुत्सित और ईर्ष्यापूर्ण विचार के वशीभूत होकर उस पड़ोसन ने अपनी गाय को बाहर बांधने के स्थान पर अपने घर के भीतर ही बांधना आरंभ कर दिया ।
कुछ दिनों पश्चात रविवार का पावन दिन आया। वृद्धा अपनी दैनिक और कठोर दिनचर्या के अनुसार प्रातःकाल उठी। स्नान करने के पश्चात जब वह घर लीपने के लिए गोबर लेने हेतु अपनी पड़ोसन के घर गई, तो उसने देखा कि वहां गाय नहीं है। पड़ोसन ने जानबूझकर गाय को भीतर बांध लिया था ताकि वृद्धा को गोबर प्राप्त न हो सके । वृद्धा ने पड़ोसन से गोबर मांगा, परंतु उस दुष्ट स्त्री ने कठोर वचनों के साथ गोबर देने से स्पष्ट इंकार कर दिया。
गाय का गोबर न मिल पाने के कारण वृद्धा अत्यंत निराश होकर अपने घर लौट आई। गोबर के अभाव में वह अपने घर के आंगन को लीप कर पवित्र नहीं कर सकी। और क्योंकि उसका यह अटल प्रण था कि बिना घर को गोबर से पवित्र किए वह भगवान की पूजा नहीं करेगी, अतः घर शुद्ध न होने के कारण उस धर्मनिष्ठ वृद्धा ने न तो भगवान सूर्यदेव को अर्घ्य दिया, न ही उन्हें भोग लगाया और न ही स्वयं अन्न या जल का एक दाना भी ग्रहण किया । उसने पूरे दिन निराहार और निर्जला रहकर भगवान सूर्य का ध्यान किया और रात्रि में भूखी-प्यासी ही, भगवान का स्मरण करते हुए सो गई ।
उस वृद्धा की इस अटूट श्रद्धा, धर्म के प्रति निष्ठा और निराहार व्रत के कष्ट को देखकर करुणासागर भगवान सूर्यनारायण अत्यंत प्रसन्न हुए और उनका हृदय पसीज गया। उसी रात्रि साक्षात् सूर्यदेव ने स्वप्न में दिव्य रूप में प्रकट होकर वृद्धा को दर्शन दिए । सूर्यदेव का वह स्वरूप करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, परंतु भक्त के लिए अत्यंत शीतलता प्रदान करने वाला था。
भगवान सूर्यदेव ने अत्यंत मधुर वाणी में वृद्धा से उसकी इस व्याकुलता और निराहार रहने का कारण पूछा । वृद्धा ने अत्यंत करुण स्वर में, हाथ जोड़कर और अश्रुपूर्ण नेत्रों से सूर्यदेव को पड़ोसन द्वारा गोबर न दिए जाने और घर अपवित्र रहने का संपूर्ण वृत्तांत सत्य-सत्य सुना दिया。
वृद्धा की करुण पुकार सुनकर भगवान सूर्यदेव ने कहा, "हे माता! तुम शोक मत करो। तुमने मेरी पूजा के लिए जो यह शारीरिक और मानसिक कष्ट सहा है, उससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं जानता हूँ कि तुम मेरी एक सच्ची और निस्वार्थ भक्त हो। तुम्हारी इस अटूट निष्ठा के प्रतिफल स्वरूप, मैं तुम्हें एक ऐसी दिव्य और चमत्कारी गाय प्रदान करता हूँ जो तुम्हारी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करेगी और तुम्हें कभी किसी के समक्ष हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। यह गाय सर्वदा तुम्हारी रक्षा करेगी।" यह वरदान देकर भगवान सूर्यनारायण अंतर्ध्यान हो गए ।
प्रातःकाल जब वृद्धा की आंख खुली और वह अपने घर के आंगन में आई, तो उसकी आंखों पर उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने देखा कि उसके आंगन में एक अत्यंत सुंदर, पुष्ट, दिव्य गाय और एक मनोहर बछड़ा बंधा हुआ है । वृद्धा उस ईश्वरीय वरदान को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुई। उसका रोम-रोम भगवान सूर्य की स्तुति करने लगा। उसने तुरंत गाय को हरा चारा डाला, जल पिलाया और उसकी भावपूर्ण सेवा करने लगी。
कुछ समय पश्चात जब उस दिव्य गाय ने गोबर किया, तो वृद्धा यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वह साधारण गोबर नहीं था, अपितु वह 'विशुद्ध स्वर्ण (सोने) का गोबर' था । वृद्धा ने अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक और भगवान का धन्यवाद करते हुए उस स्वर्ण के गोबर को उठा लिया और उसे सुरक्षित रख दिया。
उधर, जब उस ईर्ष्यालु पड़ोसन ने वृद्धा के आंगन में उस अत्यंत सुंदर और कामधेनु समान गाय को देखा, तो वह और अधिक जल-भुन गई। उसकी ईर्ष्या की कोई सीमा न रही। उसी समय उसकी कुटिल दृष्टि गाय के द्वारा किए गए स्वर्ण रूपी गोबर पर पड़ी। स्वर्ण का गोबर देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं और उसके मन में घोर लालच उत्पन्न हो गया। वृद्धा की अनुपस्थिति का लाभ उठाते हुए, उस दुष्ट पड़ोसन ने तुरंत अपनी साधारण गाय का गोबर उठाया और उसे ले जाकर वृद्धा की गाय के पास रख दिया, तथा उस दिव्य गाय का स्वर्ण का गोबर चुराकर अपने घर ले गई ।
यह क्रम कई दिनों तक अनवरत चलता रहा। वृद्धा अत्यंत भोली और सरल स्वभाव की थी; वह इस छल-कपट और धूर्तता को तनिक भी समझ न सकी। वह प्रतिदिन प्रातःकाल उठती, गाय के पास जाती और वहां रखा हुआ अपनी पड़ोसन की गाय का साधारण गोबर ही पाती। वह उसी साधारण गोबर से अपने घर को लीपती और भगवान की पूजा करके संतुष्ट रहती थी । उसे अपने स्वर्ण के छिन जाने का कोई आभास ही नहीं था。
परंतु भगवान सूर्यनारायण, जो संपूर्ण चराचर जगत के दृष्टा हैं, उनसे यह अनीति और अपनी परम भक्त के साथ हो रहा यह निरंतर छल सहन नहीं हुआ। उन्होंने उस धूर्त पड़ोसन को सबक सिखाने और अपनी भक्त को सत्य का ज्ञान कराने का निश्चय किया। संध्या के समय जब वृद्धा अपनी गाय को आंगन में बांध रही थी, तभी भगवान सूर्यदेव ने अचानक अत्यंत तीव्र आंधी और भयंकर तूफान उत्पन्न कर दिया ।
आंधी-तूफान को भयंकर रूप लेता देख, वृद्धा को अपनी गाय और बछड़े की चिंता सताने लगी। उसने तुरंत अपनी गाय और बछड़े को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें बाहर आंगन से खोलकर अपने घर के भीतर ही बांध दिया । आंधी रात भर चलती रही और वृद्धा चैन से सोती रही。
अगले दिन प्रातःकाल जब वृद्धा उठी, तो उसने देखा कि उसकी गाय ने घर के भीतर ही गोबर किया है, और वह गोबर साक्षात् स्वर्ण का है। स्वर्ण का गोबर देखकर उसे अत्यंत विस्मय हुआ। तब जाकर उस भोली वृद्धा को पड़ोसन की संपूर्ण धूर्तता, उसके द्वारा प्रतिदिन किए जाने वाले गोबर के परिवर्तन और भगवान की कृपा का पूर्ण सत्य ज्ञात हुआ। इसके पश्चात वृद्धा सतर्क हो गई और उसने अपनी चमत्कारी गाय को सदैव घर के भीतर ही बांधना आरंभ कर दिया। स्वर्ण के गोबर से वह वृद्धा कुछ ही समय में अत्यंत समृद्ध और नगर की सबसे धनी स्त्री बन गई ।
उधर वह कुटिल पड़ोसन जब देखा कि गाय घर के भीतर बंधने लगी है और अब वह स्वर्ण का गोबर नहीं चुरा सकती, तो ईर्ष्या और क्रोध के कारण वह सीधे उस नगर के राजा के पास जा पहुंची। उसने राजा के दरबार में जाकर राजा को प्रणाम किया और कहा, "हे राजन! मैं आपके राज्य की एक सामान्य प्रजा हूँ। मैं आपको एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना देने आई हूँ। मेरे पड़ोस में रहने वाली एक अत्यंत निर्धन और साधारण बुढ़िया के पास एक ऐसी चमत्कारी गाय आ गई है जो सोने का गोबर देती है। हे महाराज! ऐसी दिव्य और बहुमूल्य वस्तु तो किसी राज्य के अधिपति, एक राजा के महल में ही शोभा देती है, न कि किसी साधारण बुढ़िया की झोपड़ी में। आपको तुरंत उस गाय को अपने अधिकार में ले लेना चाहिए।" ।
राजा ने जब एक गाय के सोने के गोबर देने की बात सुनी, तो उसके मन में भी घोर लोभ और लालच उत्पन्न हो गया। राजा ने बिना कुछ विचारे तुरंत अपने सैनिकों और दूतों को वृद्धा के घर भेजा और आदेश दिया कि उस गाय को तुरंत राजमहल में प्रस्तुत किया जाए。
राजा के क्रूर दूत वृद्धा के घर पहुंचे और बलपूर्वक उस चमत्कारी गाय तथा बछड़े को राजमहल की ओर ले जाने लगे। वृद्धा ने रो-रोकर सैनिकों से गुहार लगाई, "हे भाइयो! यह गाय मुझे भगवान सूर्यदेव ने वरदान स्वरूप दी है। इसे मत ले जाओ, इसके बिना मेरा धर्म और जीवन नष्ट हो जाएगा।" परंतु सैनिकों ने उसकी एक न सुनी। राजा की आज्ञा का उल्लंघन न करने के भय से वृद्धा चुपचाप रह गई, परंतु उसका हृदय भीतर ही भीतर भगवान सूर्यदेव से प्रार्थना कर रहा था और वह फूट-फूट कर विलाप कर रही थी ।
इधर, राजा उस दिव्य गाय को पाकर अत्यंत प्रसन्न और गर्वित हुआ। उसने तुरंत अपने सेवकों को आदेश दिया, "इस गाय के लिए एक विशेष स्थान निर्मित किया जाए और इसकी रक्षा का कड़ा प्रबंध किया जाए। मेरी स्पष्ट आज्ञा है कि इसके गोबर को मेरी बिना आज्ञा के कोई भी न उठाए और कोई इसे यहाँ से तनिक भी न हिलाए।" राजा को यह आशा थी कि प्रातःकाल वह बहुत सारा स्वर्ण प्राप्त करेगा और उसका खजाना भर जाएगा ।
परंतु अगले दिन प्रातःकाल उठकर जब राजा सोने का गोबर पाने की तीव्र आशा से वहां पहुंचा जहाँ गाय बंधी हुई थी, तो उसके आश्चर्य, निराशा और क्रोध का कोई ठिकाना न रहा। उसने क्या देखा कि उस गाय ने कोई स्वर्ण का गोबर नहीं किया है, बल्कि अत्यधिक मात्रा में साधारण गोबर किया है, और उस गोबर की दुर्गंध से सारा राजमहल अत्यंत गंदा और अपवित्र हो गया है ।
यह देख राजा को अत्यंत क्रोध आया कि उस पड़ोसन ने उसे झूठी सूचना देकर मूर्ख बनाया है। उसने तुरंत अपने दूतों को आज्ञा दी कि उस बुढ़िया को पकड़ कर राजदरबार में उपस्थित किया जाए。
दूतों ने बुढ़िया के घर जाकर उसको राजा की कठोर आज्ञा सुनाई। तब वृद्धा अत्यंत भयभीत अवस्था में, कांपते हुए राजदरबार में पहुंची। राजा ने अत्यंत क्रोधित और ऊंचे स्वर में कहा, "बुढ़िया माता! मैंने तो सुना था कि तुम्हारी गाय सोने का गोबर देती है, इसी कारण मैंने तुम्हारी गाय को राजमहल में खुलवाया था। परंतु अब मैंने स्वयं देखा है कि यह बात तो सर्वथा असत्य और भ्रामक है। इसने सोने का गोबर तो नहीं दिया, उल्टे मेरे पूरे महल को गंदा कर दिया है। यह क्या वृतांत है? तुमने यह प्रपंच क्यों रचा? मुझे सत्य-सत्य सुनाओ!" ।
तब वृद्धा माता ने हाथ जोड़कर, भयमुक्त होकर राजा को अपने रविवार व्रत का नियम, पड़ोसन की ईर्ष्या, गोबर न मिलने के कारण निराहार रहने, भगवान सूर्यदेव के स्वप्न का, गाय की प्राप्ति और उस ईर्ष्यालु पड़ोसन द्वारा स्वर्ण का गोबर चुराने का सारा वृत्तांत सत्य-सत्य और विस्तारपूर्वक सुना दिया ।
वृद्धा की बात सुनकर राजा विचार में पड़ गया। उसी दिन रात्रि में भगवान सूर्यनारायण ने राजा को भी स्वप्न में दर्शन दिए। परंतु इस बार भगवान का स्वरूप अत्यंत उग्र और क्रोधित था। उन्होंने राजा से अत्यंत भयानक स्वर में कहा, "हे मूर्ख राजन! तूने अपने लोभ के वशीभूत होकर मेरी परम भक्त को कष्ट दिया है। उस गाय को उस वृद्धा को तुरंत लौटाने में ही तेरा और तेरे राज्य का भला है। उसके रविवार के व्रत और निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर ही मैंने उसे यह दिव्य गाय दी थी। यदि तूने प्रातः होते ही वह गाय और बछड़ा उसे ससम्मान नहीं लौटाया, तो मैं तेरे संपूर्ण राज्य को भस्म कर दूँगा। तुम्हारे राज्य में भयंकर भूकम्प आएगा, तुम्हारा यह अहंकार रूपी महल नष्ट हो जाएगा और तुम्हारे राज्य का समूल विनाश हो जाएगा!" ।
सूर्य भगवान के इस भयंकर स्वप्न और चेतावनी से राजा बुरी तरह भयभीत हो गया। उसके पसीने छूट गए और उसकी निद्रा भंग हो गई। प्रातः उठते ही उसने बिना एक क्षण की देरी किए उस वृद्धा को ससम्मान राजदरबार में बुलवाया। राजा ने अपने अहंकार को त्याग कर उस वृद्धा के चरण स्पर्श किए, अपनी गलती के लिए उससे क्षमा माँगी और उसकी चमत्कारी गाय तथा बछड़ा उसे अत्यंत सम्मानपूर्वक लौटा दिया ।
इसके अतिरिक्त, राजा ने अपनी ओर से भी बहुत सा धन, आभूषण और वस्त्र वृद्धा को भेंट स्वरूप दिए ताकि उसे हुए मानसिक कष्ट का कुछ प्रायश्चित हो सके। तत्पश्चात, राजा ने उस दुष्ट पड़ोसन और उसके पति को राजदरबार में बुलवाया और उनकी धूर्तता, चोरी तथा ईर्ष्या के लिए उन्हें उचित और कठोर दंड दिया ।
आश्चर्य की बात यह थी कि जैसे ही राजा ने वृद्धा को गाय लौटाई और पश्चाताप किया, राजा के महल से सारी गंदगी और दुर्गंध स्वतः ही दूर हो गई ।
इन सभी घटनाओं से राजा के मन में भगवान सूर्यनारायण के प्रति अगाध श्रद्धा उत्पन्न हो गई। उसने उसी दिन पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाकर यह घोषणा करवाई कि, "आज से इस राज्य के सभी स्त्री-पुरुष, राज्य की भलाई, सुख-शांति और अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए निष्ठापूर्वक भगवान सूर्य का रविवार का व्रत किया करें।" ।
जनता ने राजा की आज्ञा का सहर्ष और भक्तिपूर्वक पालन किया तथा संपूर्ण राज्य में रविवार का व्रत विधि-विधान से किया जाने लगा। रविवार का व्रत करने के प्रताप और सूर्यदेव की कृपा से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए। चारों ओर खुशहाली छा गई, राज्य से अकाल, महामारी और बीमारियां सर्वदा के लिए समाप्त हो गईं। सभी लोगों के शारीरिक कष्ट दूर हो गए। जो स्त्रियां निःसंतान थीं, सूर्यदेव की कृपा से उनकी गोद भर गई। राज्य में सभी स्त्री-पुरुष धर्म का आचरण करते हुए सुखपूर्वक अपना जीवन-यापन करने लगे ।
द्वितीय संस्करण: निर्धन ब्राह्मण और राजा को पुत्र-प्राप्ति की कथा
पारंपरिक व्रत-पुस्तिकाओं में भगवान सूर्यदेव की महिमा को प्रमाणित करने वाला एक अन्य अत्यंत प्रामाणिक और भावपूर्ण प्रसंग भी पढ़ा जाता है। यह कथा विशेष रूप से दरिद्रता के नाश और संतान-प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। यह कथा इस प्रकार है:
सूत जी महाराज कहते हैं— हे ऋषियों! प्राचीन काल में किसी नगर में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण स्वभाव से अत्यंत सात्विक और धर्म-कर्म में पूर्ण निष्ठा रखने वाला था। वह नित्यप्रति पूरे श्रद्धा-भाव से संध्या-वंदन करता और भगवान सूर्यनारायण की पूजा-अर्चना करता था। परंतु उसके भाग्य में घोर दरिद्रता लिखी थी। उसके पास न तो रहने के लिए उचित घर था, न ही पहनने के लिए वस्त्र और न ही खाने के लिए पर्याप्त अन्न। भूख-प्यास से व्याकुल वह ब्राह्मण भिक्षा के लिए धरती पर दर-दर घूमता रहता था, परंतु फिर भी उसकी आवश्यकताएं पूरी नहीं होती थीं। ब्राह्मण अपनी इस घोर दरिद्रता और कष्टपूर्ण जीवन से अत्यंत दुखी रहता था ।
एक दिन वह ब्राह्मण अत्यंत निराश होकर एक वन में बैठा हुआ अपने भाग्य को कोस रहा था। उसी समय ब्राह्मणों और भक्तों से प्रेम करने वाले, करुणा के सागर भगवान सूर्यदेव ने एक अति वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उस निर्धन ब्राह्मण के पास आए。
वृद्ध ब्राह्मण रूपी सूर्यदेव ने अत्यंत स्नेहपूर्ण स्वर में पूछा, "हे विप्रवर! तुम इस सुनसान स्थान पर नित्य दुखी होकर क्यों बैठे रहते हो? तुम पृथ्वी पर इतने व्याकुल क्यों घूमते हो? तुम्हारी इस घोर चिंता का क्या कारण है?" ।
दीन ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर कहा, "हे महात्मा! मैं एक अत्यंत निर्धन और अभागा ब्राह्मण हूँ। भिक्षा के लिए धरती पर घूमता हूँ, परंतु मुझे पर्याप्त भिक्षा भी प्राप्त नहीं होती। मेरी दरिद्रता किसी भी प्रकार से दूर नहीं हो रही है। हे भगवान! यदि आप मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का कोई उपाय जानते हों, तो कृपया मुझ पर दया करके मुझे वह मार्ग बताइए।" ।
तब उस वृद्ध स्वरूप भगवान सूर्यदेव ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, "हे ब्राह्मण! तुम चिंता मत करो। भगवान सूर्यनारायण मनोवांछित फल देने वाले और दरिद्रता का नाश करने वाले प्रत्यक्ष देवता हैं। तुम उनके निमित्त 'रविवार का व्रत' करो। रविवार के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से शुद्ध होकर भगवान सूर्य को विधि-विधान से जल का अर्घ्य दो, उनकी कथा का श्रवण करो और आरती करो। इस व्रत को करने से तुम्हारी दरिद्रता अवश्य नष्ट हो जाएगी।" यह कहकर वे वृद्ध ब्राह्मण अंतर्ध्यान हो गए ।
ब्राह्मण को यह समझते देर न लगी कि उसे साक्षात् किसी दैवीय शक्ति ने मार्ग दिखाया है। उसने पूर्ण श्रद्धा, दृढ़ संकल्प और विश्वास के साथ आगामी रविवार से व्रत करना आरंभ कर दिया। वह प्रातःकाल उठकर भगवान सूर्य को जल अर्पित करता, व्रत-कथा कहता, लाल पुष्पों से उनकी पूजा करता और एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करता ।
उसकी इस अटूट भक्ति और व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर भगवान सूर्यनारायण ने उस पर अपनी असीम कृपा की। देखते ही देखते उस ब्राह्मण के सभी क्लेश दूर हो गए। भगवान ने उसे अपार धन-संपत्ति, ऐश्वर्य और मान-सम्मान का आशीर्वाद दिया । जो ब्राह्मण कल तक भिक्षा के लिए तरसता था, आज वह नगर का एक अत्यंत समृद्ध और प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गया। उसका जीवन सुखमय हो गया और वह एक वैभवशाली जीवन व्यतीत करने लगा。
उसी नगर के राजा के पास धन-संपदा, हाथी-घोड़े, सेना और विशाल राज्य की कोई कमी नहीं थी। परंतु राजा का सबसे बड़ा दुःख यह था कि वह निःसंतान था। पुत्र के अभाव में उसका सारा वैभव उसे व्यर्थ प्रतीत होता था。
जब राजा को उस निर्धन ब्राह्मण की अभूतपूर्व समृद्धि और चमत्कारी उत्कर्ष का समाचार मिला, तो उसे अत्यंत आश्चर्य हुआ। उसने उस ब्राह्मण को आदरपूर्वक अपने राजदरबार में बुलवाया। राजा ने ब्राह्मण को ससम्मान आसन ग्रहण कराया और पूछा, "हे विप्रवर! कुछ ही समय पूर्व तक आप अत्यंत निर्धन थे। आपने ऐसा कौन सा महा-अनुष्ठान, यज्ञ या व्रत किया है जिससे आप पर देवताओं की इतनी कृपा हुई और आपको यह अपार ऐश्वर्य प्राप्त हुआ?" ।
ब्राह्मण ने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा, "महाराज! मैंने कोई बड़ा यज्ञ या अनुष्ठान नहीं किया है। मैंने तो केवल भगवान सूर्यनारायण का 'रविवार व्रत' पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ किया है। सूर्य भगवान की असीम कृपा से ही मेरी दरिद्रता का नाश हुआ है और मुझे यह सारा धन प्राप्त हुआ है।" ।
यह सुनकर राजा के मन में आशा की एक किरण जाग्रत हुई। उसने ब्राह्मण से कहा, "हे ब्राह्मण देव! मेरे पास इस राज्य में सब कुछ है, परंतु मेरे कोई पुत्र नहीं है। पुत्र के बिना मेरा यह राज्य सूना है। यदि मैं भी भगवान सूर्यदेव की पूजा करूँ और रविवार का व्रत करूँ, तो क्या सूर्यदेव की कृपा से मुझे पुत्र की प्राप्ति हो सकती है?" ।
ब्राह्मण ने अत्यंत दृढ़ विश्वास और उत्साह के साथ उत्तर दिया, "क्यों नहीं हो सकता, महाराज? भगवान सूर्यनारायण तो सर्वशक्तिमान हैं और सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। जो कोई भी सच्चे हृदय से भगवान सूर्य की पूजा करता है, रोज सुबह उठकर सूर्य भगवान को जल चढ़ाता है, लाल पुष्पों से उनकी वंदना करता है, रविवार की कथा सुनता है और आरती करता है, उसकी सारी मनोकामनाएं—चाहे वह धन हो, स्वास्थ्य हो या संतान हो—भगवान अवश्य पूरी करते हैं।" ।
तदुपरांत ब्राह्मण ने राजा को रविवार व्रत की संपूर्ण विधि विस्तारपूर्वक बता दी। ब्राह्मण के कहे अनुसार राजा ने अपनी रानी के साथ मिलकर पूर्ण निष्ठा, भक्ति और नियमों के साथ रविवार का व्रत आरंभ किया। उन्होंने गरीबों को दान दिया और सूर्य भगवान की उपासना की。
भगवान सूर्यनारायण की असीम कृपा और उस पवित्र व्रत के प्रताप से कुछ ही समय पश्चात राजा की रानी गर्भवती हुई और समय आने पर उसने एक अत्यंत सुंदर, स्वस्थ और तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया । पुत्र-रत्न की प्राप्ति से संपूर्ण राज्य में आनंद की लहर दौड़ गई। राजा ने ब्राह्मणों को प्रचुर दान-दक्षिणा दी और सभी ने भगवान सूर्यनारायण की महिमा का गुणगान किया。
(इस कथा के अंत में पारंपरिक रूप से यह फल-वचन कहा जाता है: "हे सूर्य भगवान! जैसे आपने ब्राह्मण की दरिद्रता दूर कर उसकी मनोकामना पूरी की, जैसे आपने राजा को पुत्र-रत्न देकर उसकी मनोकामना पूरी की, वैसे ही इस कथा को कहते, सुनते और हुंकारा भरते हुए सब भक्तों पर अपनी कृपा करना और सबकी मनोकामना पूरी करना।" )
तृतीय संस्करण: तपसी-लपसी की लोक-कथा (व्रत-सुरक्षा हेतु पारंपरिक वाचन)
भारतीय लोक-परंपरा और व्रत-विधानों में यह एक अटल मान्यता है कि किसी भी मुख्य व्रत-कथा (विशेषतः रविवार व्रत) की समाप्ति पर 'तपसी और लपसी' (Tapsi-Lapsi) की यह कथा अनिवार्य रूप से सुनी जानी चाहिए। यदि मुख्य कथा के पश्चात इस लोक-कथा का श्रवण नहीं किया जाता है, तो मान्यता है कि मुख्य व्रत और कथा का पुण्य फल व्रती को प्राप्त न होकर उस 'तपसी' को चला जाता है । अतः व्रत की पूर्णता और फल की प्राप्ति हेतु यह कथा इस प्रकार कही जाती है:
एक समय की बात है, दो व्यक्ति थे। एक का नाम 'तपसी' (तपस्वी) था और दूसरे का नाम 'लपसी' (साधारण गृहस्थ या उपासक) था। तपसी अत्यंत कठोर स्वभाव का था। वह वन में जाकर अत्यंत कठोर तपस्या करता था। उसने भूख-प्यास त्याग कर अपने शरीर को सुखा लिया था और उसे अपनी तपस्या पर अत्यंत अहंकार था。
दूसरी ओर, लपसी एक अत्यंत सरल और सात्विक गृहस्थ था। वह कहीं वन में नहीं जाता था, बल्कि अपने घर पर रहकर ही प्रतिदिन अपने भगवान की भक्ति करता था। उसका नित्य का नियम था कि वह सवा सेर आटे और गुड़ की शुद्ध 'लापसी' (हलवा) बनाता, प्रेमपूर्वक भगवान को भोग लगाता, घंटी बजाता और स्वयं उसे प्रसाद रूप में जीम (खा) लेता था ।
एक दिन देवर्षि नारद जी, जो तीनों लोकों में विचरण करते रहते हैं, पृथ्वी लोक का भ्रमण करते हुए वहां आ पहुंचे। तपसी और लपसी दोनों ने देवर्षि नारद को देखा और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। दोनों के मन में अपनी-अपनी भक्ति को लेकर एक प्रश्न था। दोनों ने नारद जी से पूछा, "हे मुनिवर! आप त्रिकालदर्शी हैं, संपूर्ण जगत का रहस्य जानते हैं। कृपया बताइए कि हम दोनों में से बड़ा कौन है? किसकी उपासना अधिक श्रेष्ठ है, मेरी कठोर तपस्या या इस लपसी का साधारण भोग?" ।
नारद जी ने उन दोनों को ध्यान से देखा और एक क्षण विचार करके बोले, "तुम दोनों अपने स्थान पर खड़े हो जाओ। इसका निर्णय अभी हो जाएगा।"
जैसे ही वे दोनों अपनी जगह पर खड़े हुए, एक अत्यंत आश्चर्यजनक घटना घटी। तपसी के पैर के नीचे से एक चमकती हुई मूल्यवान अंगूठी निकल कर बाहर गिर पड़ी। वास्तविकता यह थी कि वह अंगूठी तपसी ने अपनी तपस्या के समय मार्ग में पड़ी हुई पाई थी। उसके मन में लालच आ गया था और उसने उसे भगवान को अर्पित करने या किसी को देने के बजाय, अपने पैर के नीचे छिपा लिया था (ताकि कोई अन्य उसे न ले जाए) ।
वह अंगूठी देखते ही नारद जी का मुख क्रोध से लाल हो गया। उन्होंने तपसी को फटकारते हुए कहा, "रे तपसी! तूने इतने वर्षों तक इतनी कठोर तपस्या कर ली, अपने शरीर को कष्ट दिया, परंतु तेरे मन का मैल और लालच अभी तक नहीं गया। तेरे भीतर लोभ शेष है, और जहाँ लोभ है, वहाँ तपस्या का कोई मूल्य नहीं। तूने तो चोरी की है। इस लपसी ने घर में रहकर ही सही, पर सत्य और निष्ठा से भगवान का भोग लगाया है। जा, अब तुझे तेरी इस लंबी तपस्या का कोई फल नहीं मिलेगा। तेरी तपस्या भंग हो गई!" ।
नारद जी के ये कठोर वचन सुनते ही तपसी घबरा गया और जोर-जोर से रोने लगा। वह फूट-फूट कर विलाप करता हुआ नारद जी के चरणों में गिर पड़ा और प्रार्थना करने लगा, "हे महाराज! भगवान के लिए ऐसा मत करो! मुझ पर दया करें। मुझसे भारी भूल हुई है। मैंने लालचवश ऐसा किया। कृपया मुझे बताएं कि अब मुझे मेरी तपस्या का फल कैसे मिलेगा? मेरा उद्धार कैसे होगा?" ।
तब देवर्षि नारद जी ने उस पर दयार्द्र होकर कहा, "हे तपसी! तेरी तपस्या का फल अब तुझे स्वयं नहीं मिलेगा। परंतु तुझे वे लोग फल देंगे जो पृथ्वी पर व्रत-उपवास करते हैं और कथाएं सुनते हैं, परंतु कुछ नियमों की अवहेलना करते हैं। मैं तुझे कुछ नियम बताता हूँ, जो भी इनका पालन नहीं करेगा, उसके व्रत का पुण्य तुझे मिल जाएगा। ध्यान से सुन:
१. जो व्यक्ति अपने घर में पहली रोटी गाय की और आखिरी रोटी कुत्ते की नहीं बनाएगा, उसके सभी व्रतों और पूजा-पाठ का फल तुझे मिल जाएगा। २. जो व्यक्ति भगवान की पूजा करते समय उनके समक्ष दीवा (दीपक) जलाकर हाथ नहीं जोड़ेगा, उसकी पूजा का फल तुझे मिल जाएगा। ३. जो व्यक्ति ब्राह्मण को घर बुलाकर भोजन कराएगा, परंतु उसे उचित दक्षिणा या साड़ी-ब्लाउज आदि भेंट नहीं देगा, उसके सारे पुण्य का फल तुझे मिल जाएगा। ४. जो व्यक्ति रात में अपने घर में जूठे बर्तन छोड़ेगा, उसके सारे पुण्य का फल तुझे मिल जाएगा। ५. और सबसे महत्वपूर्ण बात—जो व्यक्ति अपनी कोई भी मुख्य व्रत-कथा (जैसे रविवार व्रत कथा) सुनकर तेरी (तपसी-लपसी की) यह कहानी नहीं कहेगा और न ही सुनेगा, तब उस व्रत करने वाले के सारे पुण्य, सारे फल और संपूर्ण कथा का लाभ तुझे ही प्राप्त हो जाएगा।" ।
बस, तभी से हिंदू धर्म में यह अटल लोक-परंपरा बन गई कि सभी कथा-कहानियों के बाद 'तपसी-लपसी' की कहानी अनिवार्य रूप से सुनी जाती है। मान्यता है कि "इस कहानी को ना सुनो तो किसी भी कथा-कहानी का फल नहीं मिलता और वह तपसी को चला जाता है।" अतः कथा के अंत में सभी भक्त श्रद्धापूर्वक कहते हैं— "बोलिए तपसी-लपसी की जय हो!" ।
३. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति
रविवार व्रत कथा का पारंपरिक समापन सदैव भगवान सूर्यनारायण की फलश्रुति के साथ किया जाता है। फलश्रुति कथा का वह अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र अंग है जिसमें व्रत का पालन करने वाले और कथा का पूर्ण श्रद्धा से श्रवण करने वाले भक्तों को प्राप्त होने वाले फलों (लाभों) का विस्तृत वर्णन होता है । पारंपरिक पाठों में यह फल-वचन अत्यंत पवित्र और अचूक माना गया है। कथा की समाप्ति पर इसे सस्वर पढ़ा जाता है:
पारंपरिक फल-वचन: "जो कोई भी स्त्री अथवा पुरुष पूर्ण श्रद्धा, नियम और पूर्ण निष्ठा के साथ इस रविवार की कथा को पढ़ता है, सुनता है या हुंकारा भरता है, भगवान सूर्यनारायण उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं ।
इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के जीवन से दरिद्रता का समूल नाश होता है और उसे अटूट धन-धान्य, ऐश्वर्य, पद, मान-सम्मान और समाज में सर्वत्र प्रतिष्ठा प्राप्त होती है । भगवान सूर्य की असीम कृपा से मनुष्य को दीर्घायु, तेज, बल, श्रेष्ठ बुद्धि, आरोग्य और यश की प्राप्ति होती है ।
जो व्यक्ति किसी भी प्रकार की भयंकर शारीरिक व्याधियों, विशेषकर कुष्ठ रोग, दाद-खाज (ringworm), नेत्र रोग या त्वचा संबंधी किसी भी असाध्य रोगों से पीड़ित हैं, वे यदि इस रविवार के व्रत को करते हैं और लाल वस्त्र धारण कर लाल पुष्पों से सूर्यदेव की उपासना करते हैं, तो उनके सभी रोग समूल नष्ट हो जाते हैं और उन्हें पूर्ण आरोग्य की प्राप्ति होती है ।
इस व्रत को करने से निःसंतान दंपत्तियों को सूर्यदेव की कृपा से स्वस्थ और तेजस्वी संतान की प्राप्ति होती है। मनुष्य अपने शत्रुओं और विरोधियों पर सर्वदा विजय प्राप्त करता है और उसे जीवन के सभी क्लेशों से मुक्ति मिल जाती है । यह व्रत मनुष्य को जीवन-मरण के बंधन और माया-मोह से मुक्त कर मोक्ष के मार्ग पर प्रशस्त करता है ।
अतः हे भगवान सूर्यनारायण! हे दिनकर! हे दिवाकर! जिस प्रकार आपने उस निर्धन बुढ़िया का घर धन-धान्य और स्वर्ण से भर दिया, जिस प्रकार आपने उस निर्धन ब्राह्मण की दरिद्रता दूर कर उसे अपार संपदा दी, और जिस प्रकार आपने राजा को पुत्र-रत्न की प्राप्ति कराकर उसके जीवन का अंधकार दूर किया, उसी प्रकार इस कथा को कहते, सुनते और मनन करते हुए हम सभी भक्तों पर अपनी असीम कृपा दृष्टि बनाए रखना। हमारे सभी शारीरिक, दैविक और भौतिक कष्टों को दूर करना, हमारे घर में सुख-शांति का वास करना और अंत में हमें मोक्ष प्रदान करना।" ।
॥ बोलिए साक्षात् प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्यनारायण की जय ॥