विस्तृत उत्तर
द्रौपदी के स्वयंवर के पीछे एक गहरी रणनीति और पूर्वजन्म की कथा दोनों जुड़े हैं।
द्रौपदी का जन्म ही असाधारण था — पांचाल नरेश महाराज द्रुपद ने याज और उपयाज ऋषियों के माध्यम से एक विशाल यज्ञ करवाया था। इस यज्ञकुंड से अग्निदेव ने उन्हें एक पुत्र और एक पुत्री प्रदान की। पुत्र का नाम धृष्टद्युम्न और पुत्री का नाम द्रौपदी रखा गया। आकाशवाणी हुई कि यह कन्या क्षत्रियों के संहार और कौरवों के विनाश के लिए अवतरित हुई है।
स्वयंवर रखने का मुख्य कारण था — द्रुपद की गुरु द्रोणाचार्य से पुरानी प्रतिशोध की इच्छा। द्रोण ने पांडवों और कौरवों से गुरुदक्षिणा में द्रुपद का आधा राज्य छीन लिया था। तब द्रुपद ने संकल्प किया कि वे द्रौपदी का विवाह अर्जुन से ही करवाएंगे, क्योंकि केवल अर्जुन जैसा महाधनुर्धर ही द्रोण को हरा सकता था।
स्वयंवर की शर्त जानबूझकर अत्यंत कठिन रखी गई — घूमती मछली के नेत्र को नीचे रखे जल के पात्र में प्रतिबिंब देखकर भेदना था, और वह भी अत्यंत भारी और कड़े धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के बाद। इस शर्त को केवल अर्जुन जैसा अभूतपूर्व धनुर्धर ही पूरा कर सकता था।
द्रौपदी के पूर्वजन्म की कथा भी है — उन्होंने तपस्या करके भगवान शंकर से पाँच गुणों वाले पति की कामना की थी, और भगवान शंकर ने वरदान दिया था कि अगले जन्म में उन्हें पाँच श्रेष्ठ पतियों की प्राप्ति होगी। इस प्रकार स्वयंवर एक दिव्य संयोग का माध्यम बना।

