विस्तृत उत्तर
अर्जुन का प्रसिद्ध 'गांडीव' धनुष उन्हें खांडव वन दाह के अवसर पर अग्निदेव ने प्रदान किया था, जिन्होंने इसे वरुणदेव से लेकर आए थे।
गांडीव की उत्पत्ति की कथा महाभारत में इस प्रकार है: ब्रह्माजी ने एक दिव्य वृक्ष के तने से विश्वकर्मा को तीन महान धनुष बनाने को कहा — पिनाक, शार्ङग और गांडीव। इनमें से पिनाक भगवान शिव के पास रहा जो क्रमशः इंद्र, राजा जनक के पूर्वजों के पास पहुँचा और अंततः जानकी के स्वयंवर में श्रीराम ने इसे तोड़ा। शार्ङग विष्णु के पास रहा जो श्रीकृष्ण के पास आया। गांडीव वरुणदेव के पास रहा।
द्वापर युग में राजा श्वेतकि ने लगातार 12 वर्षों तक यज्ञ करके घी की धार बहाई जिससे अग्निदेव की पाचनशक्ति कमज़ोर हो गई। अग्निदेव ने ब्रह्माजी से पूछा, ब्रह्माजी ने कहा — खांडव वन को जलाओ, उसमें बड़े-बड़े दिव्य औषधीय वृक्ष हैं जो तुम्हें स्वस्थ कर देंगे। परंतु इंद्र वहाँ निवास करने वाले तक्षक नाग की रक्षा करते थे इसलिए इंद्र वर्षा करके अग्नि को बुझा देते थे।
तब अग्निदेव ने इंद्रपुत्र अर्जुन और श्रीकृष्ण से सहायता माँगी। जब दोनों ने सहमति दी तो अग्निदेव ने वरुणदेव से गांडीव और अक्षय तरकश लाकर अर्जुन को दिया और श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र दिया। इसके बाद अर्जुन ने इंद्र की वर्षा रोककर खांडव दाह में अग्निदेव की सहायता की।
गांडीव से उठी टंकार की ध्वनि मात्र से शत्रुओं के हृदय काँप जाते थे। महाभारत युद्ध के बाद अर्जुन ने इसे अग्निदेव के आदेश पर समुद्र में प्रवाहित किया जहाँ से वह वरुणदेव के पास लौट गया।





