विस्तृत उत्तर
कर्ण की असली माँ कुंती थीं — वही कुंती जो पाँचों पांडवों की भी माता थीं। इसलिए कर्ण वास्तव में पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता थे, परंतु यह रहस्य जीवनभर छिपा रहा।
कुंती का बचपन में नाम पृथा था। जब वे राजा कुंतिभोज के पास रहती थीं, तब एक बार ऋषि दुर्वासा वहाँ पधारे। कुंती ने पूरे एक वर्ष उनकी असाधारण सेवा की। प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उन्हें एक वरदान दिया — कि वे जिस भी देवता का आह्वान करें, उनसे पुत्र प्राप्त कर सकती हैं।
जिज्ञासावश कुंती ने किशोरावस्था में ही सूर्यदेव का आह्वान कर लिया। सूर्यदेव प्रकट हुए और उनके प्रताप से कुंती को एक तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ जो जन्म से ही दिव्य कवच और कुंडल धारण किए था। यही पुत्र आगे चलकर 'कर्ण' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
परंतु उस समय कुंती अविवाहित थीं। अविवाहित अवस्था में पुत्र का जन्म सामाजिक अपमान का कारण बन सकता था। लोक-लज्जा और पारिवारिक मर्यादा के भय से कुंती ने भारी मन से उस नवजात शिशु को एक बक्से में रखकर नदी में बहा दिया। वह बक्सा हस्तिनापुर के सारथी अधिरथ को मिला जिन्होंने और उनकी पत्नी राधा ने उस बालक को अपना पुत्र बनाया। राधा के पुत्र होने के कारण कर्ण 'राधेय' भी कहलाए।
यह रहस्य तब खुला जब युद्ध से पहले कुंती स्वयं कर्ण के पास गईं और उन्हें उनका वास्तविक परिचय दिया। परंतु कर्ण ने दुर्योधन की मित्रता के धर्म को छोड़ना स्वीकार नहीं किया।





