विस्तृत उत्तर
कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच जब युद्ध आरंभ होने को था, तब अर्जुन ने अचानक अपना धनुष गांडीव रख दिया और वे रथ में बैठकर शोक और मोह से ग्रस्त हो गए।
अर्जुन के मन में विचार आए — इस युद्ध में सामने खड़े हैं मेरे गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, भाई-बंधु और सम्बन्धी। इन सबको मारकर प्राप्त होने वाले राज्य का क्या अर्थ है? यह तो पाप है। मैं युद्ध नहीं करूँगा।
यह केवल कायरता नहीं थी — इसमें धर्म का गहरा संकट था। अर्जुन सच में असमंजस में थे कि क्या युद्ध करना उनका धर्म है। श्रीकृष्ण ने देखा कि अर्जुन का यह मोह केवल कायरता नहीं, बल्कि अज्ञान से उत्पन्न आत्म-भ्रम है। यदि इस समय उन्हें सही ज्ञान नहीं दिया गया, तो धर्म की हानि होगी।
इसी अवसर पर श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिया वह श्रीमद्भगवद्गीता है। उन्होंने अर्जुन को आत्मा की अमरता, कर्म-योग, ज्ञान-योग, भक्ति-योग, क्षत्रिय-धर्म और परम तत्व का ज्ञान दिया। उन्होंने बताया कि आत्मा न मरती है न जन्म लेती है, देह नाशवान है। अपने धर्म के अनुसार कार्य करना ही श्रेय है।
गीता केवल अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर नहीं है — यह समस्त मानवजाति के लिए जीवन के संकट के क्षण में मार्गदर्शन का ग्रंथ है।





