विस्तृत उत्तर
गांधारी का आँखों पर पट्टी बाँधना भारतीय पुराण-साहित्य में पतिव्रत-धर्म और असाधारण आत्मत्याग का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।
जब गांधारी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार धृतराष्ट्र से तय हुआ तब उन्हें ज्ञात नहीं था कि धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन हैं। विवाह के पश्चात जब यह सत्य उनके सामने आया, तब गांधारी ने एक ऐसा निर्णय लिया जो आज तक सराहा और विमर्शित होता है — उन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बाँधकर आजन्म अंधी रहने की प्रतिज्ञा की।
उनका विचार था — 'जब मेरे पति ही इस संसार को नहीं देख सकते, तो मुझे क्या अधिकार है इस सौंदर्य का आनंद लेने का।' पति के दुख में स्वयं को भागीदार बनाना, उनके कष्ट को अपना कष्ट समझना — यही गांधारी के इस निर्णय का मर्म है। महाभारत इसे पति के प्रति सर्वोच्च आत्म-समर्पण के रूप में प्रस्तुत करता है।
कुछ विचारक यह भी कहते हैं कि यह निर्णय केवल पतिव्रत नहीं था, बल्कि इसमें एक विरोध का भाव भी था — उनके पिता और भीष्म ने उन्हें बिना पूरी जानकारी दिए एक नेत्रहीन पुरुष से विवाह कर दिया था।
गांधारी ने अपनी पूरी जिंदगी में केवल दो बार यह पट्टी हटाई — पहली बार जब उन्होंने दुर्योधन को अपनी दृष्टि से वज्र-शरीर बनाने के लिए बुलाया (पर श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को मार्ग में रोककर केले का पत्ता लपटवा दिया) और दूसरी बार जब युद्ध के अंत में दुर्योधन घायल होकर पड़ा था।

