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वेदों में यज्ञ का महत्व क्या है?

वेदों में यज्ञ देव-मनुष्य परस्पर-सम्बन्ध का सेतु है। ऋग्वेद (1/1/1) का प्रथम श्लोक अग्नि-यज्ञ से आरंभ होता है।

संक्षिप्त उत्तर

वेदों में यज्ञ देव-मनुष्य परस्पर-सम्बन्ध का सेतु है। ऋग्वेद (1/1/1) का प्रथम श्लोक अग्नि-यज्ञ से आरंभ होता है। गीता (3/14-16) में वर्षा-अन्न-जीवन-यज्ञ का ब्रह्मांडीय चक्र बताया गया है। पाँच महायज्ञ प्रत्येक गृहस्थ का नित्य-कर्तव्य है।

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विस्तृत उत्तर

## वेदों में यज्ञ का महत्व

यज्ञ की परिभाषा: संस्कृत 'यज्' धातु से — देव-पूजन, संगतीकरण और दान। यज्ञ देवताओं और मनुष्यों के बीच परस्पर लेन-देन का सेतु है।

वेदों में यज्ञ की केन्द्रीयता: ऋग्वेद का प्रथम श्लोक ही अग्नि की स्तुति से आरंभ होता है: 'अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।' (1/1/1) — अग्नि यज्ञ का पुरोहित और देव है।

यज्ञ का वैश्विक चक्र (गीता 3/14-16): वर्षा से अन्न → अन्न से प्राणी → प्राणियों से यज्ञ → यज्ञ से वर्षा — यह ब्रह्म-प्रतिष्ठित चक्र है। जो इसमें भाग नहीं लेता वह पाप में जीता है।

यज्ञ के प्रकार: अग्निहोत्र (नित्य गृहाग्नि में हवन), दर्श-पूर्णमास (अमावस्या-पूर्णिमा), सोमयज्ञ (सोमरस से देव-तृप्ति), अश्वमेध और राजसूय (राज्य-कल्याण)।

पुरुषसूक्त (10/90) में यज्ञ: देवताओं ने पुरुष (ब्रह्म) का यज्ञ करके सृष्टि की रचना की — यज्ञ सृष्टि का ही आधार है।

पाँच महायज्ञ: ब्रह्मयज्ञ (वेदाध्ययन), देवयज्ञ (हवन), पितृयज्ञ (तर्पण), भूतयज्ञ (जीव-दान), मनुष्ययज्ञ (अतिथि-सेवा) — प्रत्येक गृहस्थ का नित्य-कर्तव्य।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

वेदों में यज्ञ का महत्व क्या है को संदर्भ सहित समझें

वेदों में यज्ञ का महत्व क्या है का सबसे सीधा सार यह है: वेदों में यज्ञ देव-मनुष्य परस्पर-सम्बन्ध का सेतु है। ऋग्वेद (1/1/1) का प्रथम श्लोक अग्नि-यज्ञ से आरंभ होता है। गीता (3/14-16) में वर्षा-अन्न-जीवन-यज्ञ का ब्रह्मांडीय चक्र बताया गया है।...

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