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वेद ज्ञान📜 ऋग्वेद 10/19, यजुर्वेद 40/2 (ईशोपनिषद), अथर्ववेद 12/3/48, शतपथ ब्राह्मण, जैमिनि मीमांसासूत्र2 मिनट पठन

वेदों में कर्म का महत्व क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

वेदों में कर्म केन्द्रीय है। यजुर्वेद (40/2) कहता है — कर्म करते हुए जियो। यज्ञ-कर्म सर्वोत्तम है। शुभ कर्म से स्वर्ग — यह वैदिक कर्मफल-सिद्धांत है। निष्काम कर्म + ज्ञान = मोक्ष — यही वेदांत का निष्कर्ष है।

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विस्तृत उत्तर

## वेदों में कर्म का महत्व

वेदों में कर्म की केन्द्रीयता: वेद — विशेषतः यजुर्वेद और ब्राह्मण ग्रंथ — कर्मकाण्ड (यज्ञ, अनुष्ठान) पर आधारित हैं। पूर्वमीमांसा दर्शन में वेद-विहित कर्म को परम धर्म माना गया है।

वैदिक कर्म-सिद्धांत के मूल सूत्र

(1) कर्म अनिवार्य है (यजुर्वेद 40/2): 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।' — कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा रखो। कर्म त्याग नहीं, कर्म से लिप्त नहीं — यही ईशोपनिषद का संदेश है।

(2) यज्ञ-कर्म सर्वश्रेष्ठ: यज्ञ सर्वोत्तम कर्म — देव-मनुष्य-प्रकृति के बीच परस्पर उपकार का माध्यम।

(3) कर्मफल का सिद्धांत: शुभ कर्म स्वर्ग, अशुभ कर्म नरक का मार्ग है।

(4) नित्य-कर्म और काम्य-कर्म: संध्यावंदन, अग्निहोत्र, पितृतर्पण — नित्य अनिवार्य। पुत्र-प्राप्ति आदि इच्छा से किए गए यज्ञ — काम्य।

(5) कर्म और मोक्ष: पूर्वमीमांसा में कर्म से स्वर्ग मिलता है; उत्तर-मीमांसा (वेदांत) में निष्काम कर्म + ज्ञान + भक्ति से मोक्ष — यही गीता का संदेश।

वेद का संदेश: कर्म करो, फल परमात्मा को अर्पण करो — यही वैदिक कर्म-विज्ञान का सार है।

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शास्त्रीय स्रोत
ऋग्वेद 10/19, यजुर्वेद 40/2 (ईशोपनिषद), अथर्ववेद 12/3/48, शतपथ ब्राह्मण, जैमिनि मीमांसासूत्र
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