विस्तृत उत्तर
## वेदों में कर्म का महत्व
वेदों में कर्म की केन्द्रीयता: वेद — विशेषतः यजुर्वेद और ब्राह्मण ग्रंथ — कर्मकाण्ड (यज्ञ, अनुष्ठान) पर आधारित हैं। पूर्वमीमांसा दर्शन में वेद-विहित कर्म को परम धर्म माना गया है।
वैदिक कर्म-सिद्धांत के मूल सूत्र
(1) कर्म अनिवार्य है (यजुर्वेद 40/2): 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।' — कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा रखो। कर्म त्याग नहीं, कर्म से लिप्त नहीं — यही ईशोपनिषद का संदेश है।
(2) यज्ञ-कर्म सर्वश्रेष्ठ: यज्ञ सर्वोत्तम कर्म — देव-मनुष्य-प्रकृति के बीच परस्पर उपकार का माध्यम।
(3) कर्मफल का सिद्धांत: शुभ कर्म स्वर्ग, अशुभ कर्म नरक का मार्ग है।
(4) नित्य-कर्म और काम्य-कर्म: संध्यावंदन, अग्निहोत्र, पितृतर्पण — नित्य अनिवार्य। पुत्र-प्राप्ति आदि इच्छा से किए गए यज्ञ — काम्य।
(5) कर्म और मोक्ष: पूर्वमीमांसा में कर्म से स्वर्ग मिलता है; उत्तर-मीमांसा (वेदांत) में निष्काम कर्म + ज्ञान + भक्ति से मोक्ष — यही गीता का संदेश।
वेद का संदेश: कर्म करो, फल परमात्मा को अर्पण करो — यही वैदिक कर्म-विज्ञान का सार है।





