विस्तृत उत्तर
वैराग्य और संन्यास दोनों आध्यात्मिक जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं, परंतु दोनों में मूलभूत अंतर है।
वैराग्य एक मानसिक अवस्था है — मन की वह स्थिति जिसमें संसार के विषयों, सुख-सुविधाओं और भोगों के प्रति आसक्ति समाप्त हो जाती है। पातंजल योगसूत्र (1.15) में वैराग्य को 'दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य' कहा गया है — अर्थात् देखे और सुने गए विषयों में तृष्णा का अभाव। वैरागी गृहस्थ जीवन में रह सकता है, परिवार के साथ रह सकता है — पर उसका मन भोगों में लिप्त नहीं होता। वैराग्य कोई विशेष वेशभूषा या जीवनशैली नहीं मांगता। यह शुद्ध मानसिक और आत्मिक अवस्था है।
संन्यास एक व्यवस्थित जीवनपद्धति है — चार आश्रमों में से अंतिम और सर्वोच्च आश्रम। मनुस्मृति (6.33-34) के अनुसार वानप्रस्थ के बाद जो व्यक्ति परिवार, सामाजिक दायित्व और भौतिक संपत्ति का संपूर्ण त्याग कर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एकमात्र मोक्ष की साधना में लीन हो जाता है, वह संन्यासी है। संन्यास में बाह्य रूप से भी परिवर्तन होता है — गेरुआ वस्त्र, भिक्षावृत्ति, सांसारिक संबंधों का त्याग।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिना वैराग्य के संन्यास ग्रहण करना निरर्थक है — यह केवल बाहरी आडंबर बन जाता है। गीता (5.2-6) में भगवान कृष्ण ने स्पष्ट कहा कि आंतरिक वैराग्य के साथ कर्म करने वाला गृहस्थ भी मोक्ष का अधिकारी है। इसलिए वैराग्य संन्यास का आधार है — वैराग्य भीतर से होता है और संन्यास उसकी बाह्य अभिव्यक्ति।





