विस्तृत उत्तर
सनातन दर्शन में 'सत्य' की परिभाषा अत्यंत गहरी और बहुआयामी है। यह केवल झूठ न बोलने तक सीमित नहीं है।
व्युत्पत्ति की दृष्टि से 'सत्य' शब्द 'सत्' धातु से बना है जिसका अर्थ है — जो है, जो अस्तित्व में है। जो शाश्वत, अविनाशी और सर्वदा एक-सा बना रहे — वही सत्य है। जो बदल जाए, नष्ट हो जाए, वह सत्य नहीं।
तैत्तिरीयोपनिषद (1.11.1) में गुरु का प्रथम आदेश है — 'सत्यं वद' — सत्य बोलो। यहाँ सत्य का अर्थ वाणी की सत्यता है — जो मन में हो, बुद्धि में हो और वाणी में हो — तीनों का एकरूप होना।
वेदांत में सत्य के तीन स्तर माने गए हैं। पाटिमात्र सत्य — जो कुछ देर के लिए सत्य लगे जैसे स्वप्न। व्यावहारिक सत्य — जो जागृत अवस्था में संसार में काम आए। और परमार्थिक सत्य — एकमात्र ब्रह्म, जो नित्य, अनादि और अनंत है। बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया — 'सत्यम् ब्रह्म' — ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है।
महाभारत (अनुशासन पर्व, 115.23) में कहा गया — 'अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते' — अहिंसा ही परम सत्य है जिससे धर्म की प्रवृत्ति होती है।
गीता (16.1-3) में सत्य को देवी संपदाओं में गिना गया है। और 'सत्यं शिवं सुंदरम्' — यह वाक्य सनातन दर्शन का सार है — सत्य ही कल्याणकारी है और सत्य ही सुंदर है।





