विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में भगवान प्राप्ति के अनेक मार्ग हैं। सबसे सरल उपाय स्वयं भगवान ने बताए हैं:
1नाम जप — सरलतम (कलियुग में विशेष)
कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।' (रामचरितमानस)
— कलियुग में केवल भगवान के नाम का स्मरण ही पर्याप्त है। 'राम', 'कृष्ण', 'ॐ नमः शिवाय', 'ॐ नमो नारायणाय' — कोई भी नाम, सच्चे भाव से।
2शरणागति — गीता 18.66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
— सब छोड़कर मेरी शरण आओ — मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त करूंगा, चिंता मत करो।
3अनन्य भक्ति — गीता 9.22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।
— जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हैं, उनका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूं।
4मन लगाओ — गीता 12.8
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।
— मुझमें मन लगाओ, मुझमें बुद्धि लगाओ — तुम मुझमें ही निवास करोगे, संशय नहीं।
5सत्संग
संतों, भक्तों की संगति। भागवत (11.12.1-2) में कहा — 'सत्सङ्गति से भक्ति उत्पन्न होती है।'
6सेवा
गरीबों, बीमारों, जरूरतमंदों की सेवा = ईश्वर सेवा। 'शिव ज्ञाने जीव सेवा' (रामकृष्ण)।
7निष्काम कर्म
अपना काम ईमानदारी से करो, फल ईश्वर पर छोड़ो (गीता 2.47)।
सबसे सरल सार
तुलसीदास — 'राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार' — जिह्वा रूपी दरवाजे पर राम नाम रूपी मणि दीपक रख दो — जीवन प्रकाशित हो जाएगा।
भगवान प्राप्ति के लिए न विशेष योग्यता चाहिए, न विद्या, न धन — केवल सच्चा भाव और प्रेम।





