विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म में मनुष्य के जीवन को चार सुव्यवस्थित चरणों में बाँटा गया है जिन्हें 'चार आश्रम' कहते हैं। इस व्यवस्था का उल्लेख जाबालोपनिषद में चारों आश्रमों के एकसाथ उल्लेख के रूप में सर्वप्रथम मिलता है और मनुस्मृति में इसे विस्तार से स्थापित किया गया है। मनु के अनुसार मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष मानकर प्रत्येक आश्रम को पच्चीस-पच्चीस वर्ष का माना गया है।
पहला आश्रम ब्रह्मचर्य है। यह विद्यार्थी जीवन है जिसमें गुरुकुल में गुरु के पास रहकर विद्या, संस्कार और अनुशासन ग्रहण किया जाता है। इंद्रिय संयम, ब्रह्मचर्य का पालन और ज्ञान-प्राप्ति इस आश्रम की आधारशिला हैं।
दूसरा आश्रम गृहस्थ है। गुरुकुल से लौटने के बाद विवाह कर परिवार स्थापित करना, धर्म-अर्थ-काम का यथायोग्य पालन करना और देव-पितृ-मनुष्य के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह — यही गृहस्थाश्रम है। यह आश्रम समाज की रीढ़ है।
तीसरा आश्रम वानप्रस्थ है। जब शरीर में झुर्रियाँ आ जाएं, बाल सफेद हों और पुत्र के भी पुत्र हो जाएं — तब सांसारिक कार्यों को उत्तराधिकारियों को सौंपकर वन या एकांत में तप, अध्यात्म और सेवा का जीवन अपनाना वानप्रस्थ है। पत्नी चाहे साथ रह सकती है।
चौथा आश्रम संन्यास है। यह मोक्ष-साधना का अंतिम और सर्वोच्च चरण है। सभी संबंधों, संपत्ति और सांसारिक आसक्तियों को पूर्णतः त्यागकर एकमात्र परमात्मा की ओर उन्मुख होना, भिक्षावृत्ति से जीवन-निर्वाह और सर्वभूतों में ईश्वर का दर्शन — यही संन्यासी का धर्म है।





