विस्तृत उत्तर
सांख्य दर्शन (कपिल मुनि) के अनुसार सृष्टि दो मूल तत्वों — प्रकृति और पुरुष — से बनी है।
पुरुष (चेतना/Consciousness)
- ▸शुद्ध चेतना, साक्षी, अकर्ता (कुछ करता नहीं — केवल देखता है)।
- ▸नित्य, निर्विकार, अचल, एक या अनेक (सांख्य में अनेक पुरुष)।
- ▸आत्मा = पुरुष।
- ▸उपमा: दर्पण (जो सब प्रतिबिंबित करता है पर स्वयं अपरिवर्तित)।
प्रकृति (जड़ पदार्थ/Nature)
- ▸जड़ (अचेतन), सक्रिय, परिवर्तनशील।
- ▸तीन गुणों (सत्व, रजस्, तमस्) का संतुलन।
- ▸समस्त भौतिक सृष्टि प्रकृति से उत्पन्न — शरीर, मन, बुद्धि, इंद्रियां, पंचभूत — सब प्रकृति।
- ▸उपमा: रंगमंच (जहां नाटक होता है — प्रकृति नाटक है, पुरुष दर्शक)।
मुख्य अंतर
| विषय | पुरुष | प्रकृति |
|---|---|---|
| स्वभाव | चेतन | जड़ |
| क्रिया | साक्षी/अकर्ता | कर्त्री/सक्रिय |
| गुण | निर्गुण | त्रिगुणात्मक |
| परिवर्तन | अपरिवर्तनशील | परिवर्तनशील |
| संख्या | अनेक (सांख्य) / एक (वेदांत) | एक |
| भोग | भोक्ता | भोग्य |
25 तत्व (सांख्य)
प्रकृति (1) → महत् (बुद्धि) (2) → अहंकार (3) → मन (4) → 5 ज्ञानेंद्रियां (5-9) → 5 कर्मेंद्रियां (10-14) → 5 तन्मात्रा (15-19) → 5 महाभूत (20-24) + पुरुष (25) = 25 तत्व।
गीता 13.19-23 — कृष्ण ने सांख्य सिद्धांत अपनाया
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।' — प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं।
दुःख का कारण (सांख्य)
पुरुष (चेतना) का प्रकृति (जड़) से तादात्म्य = बंधन। 'मैं शरीर हूं, मैं सुखी/दुःखी हूं' — यह भ्रम। वास्तव में पुरुष सदा मुक्त है, केवल प्रकृति में परिवर्तन होता है। इस भेद का ज्ञान = मोक्ष।





