विस्तृत उत्तर
यह वैदिक परंपरा की सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रार्थना है — बृहदारण्यक उपनिषद (1.3.28) से।
मूल मंत्र
ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।'
शब्दशः अर्थ
- 1असतो मा सद्गमय — असत् (अनित्य/असत्य/मिथ्या) से मुझे सत् (सत्य/शाश्वत) की ओर ले चलो।
- 1तमसो मा ज्योतिर्गमय — तमस् (अंधकार/अज्ञान) से मुझे ज्योति (प्रकाश/ज्ञान) की ओर ले चलो।
- 1मृत्योर्मा अमृतं गमय — मृत्यु (नाशवान/मरणधर्मा) से मुझे अमृत (अमरत्व/मोक्ष) की ओर ले चलो।
गहन अर्थ
तीनों पंक्तियां एक ही बात कह रही हैं, तीन दृष्टिकोणों से:
- ▸असत् → सत् = मिथ्या (संसार/माया) से सत्य (ब्रह्म) की ओर — दार्शनिक दृष्टि।
- ▸तम → ज्योति = अज्ञान से ज्ञान की ओर — ज्ञान दृष्टि।
- ▸मृत्यु → अमृत = जन्म-मृत्यु चक्र से मोक्ष की ओर — व्यावहारिक लक्ष्य।
सारांश: यह प्रार्थना मोक्ष की प्रार्थना है — सांसारिक बंधन, अज्ञान और मृत्यु चक्र से मुक्ति।
तीन शांति
तीन प्रकार के दुःखों (ताप) की शांति:
- ▸आधिदैविक — दैवी आपदाएं (प्राकृतिक, देवताजनित)।
- ▸आधिभौतिक — अन्य प्राणियों से उत्पन्न कष्ट।
- ▸आध्यात्मिक — शारीरिक/मानसिक रोग।





