विस्तृत उत्तर
यह प्रश्न सनातन शास्त्रों में विस्तार से विचारा गया है और शास्त्रों का स्पष्ट मत यह है कि गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों में सर्वश्रेष्ठ और ज्येष्ठ है।
मनुस्मृति (3.77-78) में कहा गया है कि जैसे सभी नदियाँ सागर का आश्रय लेती हैं, वैसे ही सभी आश्रम — ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास — गृहस्थाश्रम का आश्रय लेते हैं। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी — तीनों को दान, अन्न और आश्रय देकर प्रतिदिन गृहस्थ ही धारण करता है। इसीलिए गृहस्थ को 'ज्येष्ठाश्रम' कहा गया है।
भगवद्गीता (3.4-7 और 5.2-6) में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि केवल कर्म के त्याग से मनुष्य नैष्कर्म्य को नहीं पाता। 'कर्मयोगो विशिष्यते' — कर्म योग संन्यास से श्रेष्ठ है। जो गृहस्थ निष्काम भाव से कर्तव्य करता है, वह अकर्मण्य संन्यासी से कहीं श्रेष्ठ है।
राजा जनक इसके सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं — राज्य चलाते हुए, गृहस्थ रहते हुए भी वे जीवनमुक्त माने गए। संत तिरुवल्लुवर ने भी कहा है कि गृहस्थ जीवन ही धर्म का पूर्ण रूप है।
हालांकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जब वैराग्य परिपक्व हो जाए और गृहस्थ के सभी दायित्व पूर्ण हो जाएं, तो वानप्रस्थ और संन्यास की ओर जाना उचित है। आश्रम व्यवस्था का उद्देश्य यही है कि मनुष्य जीवन के हर चरण में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना करे। परंतु अपरिपक्व अवस्था में लिया गया संन्यास समाज और व्यक्ति दोनों के लिए हानिकर है।



