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हिंदू दर्शन📜 गरुड़ पुराण (35.51), बृहदारण्यक उपनिषद परंपरा, शांति मंत्र2 मिनट पठन

सर्वे भवन्तु सुखिनः श्लोक का अर्थ और महत्व

संक्षिप्त उत्तर

सर्वे भवन्तु सुखिनः = सभी सुखी हों, निरोग हों, शुभ देखें, कोई दुःखी न हो। 'सर्वे' = कोई भेद नहीं — सार्वभौमिक प्रार्थना। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' भावना। चार स्तरीय कल्याण: मानसिक सुख, शारीरिक स्वास्थ्य, सौभाग्य, दुःख मुक्ति।

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विस्तृत उत्तर

यह हिंदू दर्शन की सर्वाधिक सार्वभौमिक और समावेशी प्रार्थना है।

मूल श्लोक

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।'

शब्दशः अर्थ

  • सर्वे भवन्तु सुखिनः — सभी सुखी हों।
  • सर्वे सन्तु निरामयाः — सभी रोगमुक्त (निरोग) हों।
  • सर्वे भद्राणि पश्यन्तु — सभी शुभ (कल्याणकारी) देखें/अनुभव करें।
  • मा कश्चित् दुःखभाक् भवेत् — कोई भी दुःख का भागी न हो।

महत्व

  1. 1सार्वभौमिकता — 'सर्वे' (सभी) — कोई भेद नहीं। न जाति, न धर्म, न देश, न प्रजाति — सभी प्राणियों का कल्याण। यह हिंदू धर्म की 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार) भावना का प्रतिबिंब।
  1. 1चार स्तरों का कल्याण:
  • सुख (मानसिक शांति)
  • निरोगता (शारीरिक स्वास्थ्य)
  • भद्र दर्शन (सौभाग्य/शुभ अनुभव)
  • दुःख निवृत्ति (कष्ट से मुक्ति)
  1. 1निःस्वार्थता — यह व्यक्तिगत प्रार्थना नहीं, सामूहिक प्रार्थना है। 'मैं' नहीं, 'सब' — यह हिंदू दर्शन की उदारता और करुणा दर्शाता है।
  1. 1संयुक्त राष्ट्र में — यह मंत्र अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदू दर्शन का प्रतिनिधित्व करता है।

स्रोत: यह श्लोक विभिन्न ग्रंथों में मिलता है। इसका सटीक मूल स्रोत विवादित है — कुछ विद्वान इसे गरुड़ पुराण (35.51) से, कुछ बृहदारण्यक उपनिषद की परंपरा से जोड़ते हैं। यह एक सामूहिक शांति मंत्र है जो अनेक ग्रंथों और परंपराओं में प्रयुक्त होता है।

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शास्त्रीय स्रोत
गरुड़ पुराण (35.51), बृहदारण्यक उपनिषद परंपरा, शांति मंत्र
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