विस्तृत उत्तर
यह हिंदू दर्शन की सर्वाधिक सार्वभौमिक और समावेशी प्रार्थना है।
मूल श्लोक
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।'
शब्दशः अर्थ
- ▸सर्वे भवन्तु सुखिनः — सभी सुखी हों।
- ▸सर्वे सन्तु निरामयाः — सभी रोगमुक्त (निरोग) हों।
- ▸सर्वे भद्राणि पश्यन्तु — सभी शुभ (कल्याणकारी) देखें/अनुभव करें।
- ▸मा कश्चित् दुःखभाक् भवेत् — कोई भी दुःख का भागी न हो।
महत्व
- 1सार्वभौमिकता — 'सर्वे' (सभी) — कोई भेद नहीं। न जाति, न धर्म, न देश, न प्रजाति — सभी प्राणियों का कल्याण। यह हिंदू धर्म की 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार) भावना का प्रतिबिंब।
- 1चार स्तरों का कल्याण:
- ▸सुख (मानसिक शांति)
- ▸निरोगता (शारीरिक स्वास्थ्य)
- ▸भद्र दर्शन (सौभाग्य/शुभ अनुभव)
- ▸दुःख निवृत्ति (कष्ट से मुक्ति)
- 1निःस्वार्थता — यह व्यक्तिगत प्रार्थना नहीं, सामूहिक प्रार्थना है। 'मैं' नहीं, 'सब' — यह हिंदू दर्शन की उदारता और करुणा दर्शाता है।
- 1संयुक्त राष्ट्र में — यह मंत्र अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदू दर्शन का प्रतिनिधित्व करता है।
स्रोत: यह श्लोक विभिन्न ग्रंथों में मिलता है। इसका सटीक मूल स्रोत विवादित है — कुछ विद्वान इसे गरुड़ पुराण (35.51) से, कुछ बृहदारण्यक उपनिषद की परंपरा से जोड़ते हैं। यह एक सामूहिक शांति मंत्र है जो अनेक ग्रंथों और परंपराओं में प्रयुक्त होता है।





