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हिंदू दर्शन📜 भगवद्गीता (2.54-72)2 मिनट पठन

स्थितप्रज्ञ कौन होता है गीता के अनुसार

संक्षिप्त उत्तर

स्थितप्रज्ञ (गीता 2.55-72): सब कामनाएं त्यागकर आत्मा में संतुष्ट (2.55); दुःख-सुख-राग-भय-क्रोध से मुक्त (2.56); कछुआ जैसे इंद्रियां समेटे (2.58); समुद्र जैसे अचल — कामनाएं आएं पर विचलित न करें (2.70)। सार: भीतर शांत, बाहर कुछ भी हो।

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विस्तृत उत्तर

अर्जुन ने कृष्ण से पूछा (गीता 2.54): 'स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।'

— स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) की क्या पहचान है? वह कैसे बोलता, बैठता, चलता है?

कृष्ण ने गीता 2.55-72 में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताए:

1कामना त्याग (2.55)

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।

— जब मन की सभी कामनाएं त्याग दे और आत्मा में ही संतुष्ट रहे।

2सुख-दुख में समान (2.56)

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।

— दुःख में उद्विग्न न हो, सुख में लालसा न हो, राग-भय-क्रोध से मुक्त हो।

3निर्लिप्तता (2.57)

शुभ प्राप्त हो तो प्रसन्न न हो, अशुभ आए तो द्वेष न करे — सर्वत्र आसक्तिरहित।

4इंद्रिय संयम — कछुआ उदाहरण (2.58)

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।

— जैसे कछुआ अपने अंग समेट लेता है, वैसे ही जो इंद्रियों को विषयों से समेट ले — उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

5विषय वैराग्य (2.59)

बलपूर्वक विषय त्याग से विषय दूर होते हैं पर आसक्ति (रस) बनी रहती है। परम तत्व (ब्रह्म) का अनुभव होने पर रस भी समाप्त हो जाता है।

6क्रोध-मोह चक्र से मुक्त (2.62-63)

विषय चिंतन → आसक्ति → काम → क्रोध → मोह → स्मृतिनाश → बुद्धिनाश → सर्वनाश। स्थितप्रज्ञ इस चक्र से मुक्त है।

7अंतिम लक्षण (2.70)

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।

— जैसे समुद्र नदियों के जल से भरकर भी अचल रहता है, वैसे ही जिसमें कामनाएं आकर भी विचलित नहीं करतीं — वही शांति पाता है।

सरल सार: स्थितप्रज्ञ = भीतर शांत समुद्र — बाहर से तूफान आएं, पर भीतर अचल। सुख-दुख, जय-पराजय, लाभ-हानि — सबमें समान।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद्गीता (2.54-72)
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