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स्थितप्रज्ञ — प्रश्नोत्तरी

शास्त्रों और पुराणों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर — कुल 5 प्रश्न

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भगवद गीता

गीता में ज्ञान योग क्या है?

ज्ञान योग = आत्मा-ब्रह्म के यथार्थ बोध से मोक्ष। विचारकों के लिए। स्थितप्रज्ञ अवस्था — कामना-भय-क्रोध से मुक्त। क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का विवेक (अध्याय 13)। 'सर्वकर्म ज्ञान में परिसमाप्त होते हैं' (4)। समदर्शिता — सभी में ईश्वर दर्शन।

ज्ञान योगगीताआत्मज्ञान
हिंदू दर्शन

स्थितप्रज्ञ कौन होता है गीता के अनुसार

स्थितप्रज्ञ (गीता 2.55-72): सब कामनाएं त्यागकर आत्मा में संतुष्ट (2.55); दुःख-सुख-राग-भय-क्रोध से मुक्त (2.56); कछुआ जैसे इंद्रियां समेटे (2.58); समुद्र जैसे अचल — कामनाएं आएं पर विचलित न करें (2.70)। सार: भीतर शांत, बाहर कुछ भी हो।

स्थितप्रज्ञगीतालक्षण
गीता ज्ञान

गीता के दूसरे अध्याय का सारांश क्या है?

अध्याय 2 (सांख्य योग): (1) आत्मा अमर — 'न जायते म्रियते वा कदाचिन्' (2.20), (2) कर्मयोग — 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' (2.47), 'समत्वं योग' (2.48), (3) स्थितप्रज्ञ — सुख-दुख में समभाव (2.55-56)। गीता के लगभग सभी सिद्धांतों का बीज।

गीता अध्याय 2सांख्य योगआत्मा अमर
ध्यान साधना

ध्यान करने से जीवन में क्या बदलाव आते हैं?

ध्यान से जीवन में — मन शांत और एकाग्र होता है, क्रोध-चिंता घटती है, निर्णय-क्षमता और अंतर्ज्ञान बढ़ता है, शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। गीता (2/55-72) में स्थितप्रज्ञ के लक्षण यही बदलाव हैं। गीता (6/15) — नियमित ध्यान से परम शांति और निर्वाण मिलता है।

ध्यानजीवन परिवर्तनलाभ
गीता दर्शन

गीता में ध्यान का महत्व क्या है?

गीता अध्याय 6 (ध्यानयोग) के अनुसार नित्य ध्यान से परम शांति और निर्वाण मिलता है (6/15)। चंचल मन को बार-बार आत्मा में वापस लाना ही ध्यान का अभ्यास है। ध्यान का प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

ध्यानगीताअध्याय 6

सनातन धर्म प्रश्नोत्तरी — शास्त्रीय ज्ञान

पौराणिक प्रश्नोत्तरी पर आपको हिंदू धर्म, वेद, पुराण, भगवद गीता, रामायण, महाभारत, पूजा विधि, व्रत-त्योहार, मंत्र, देवी-देवताओं और सनातन संस्कृति से जुड़े सैकड़ों प्रश्नों के प्रामाणिक उत्तर मिलेंगे। प्रत्येक उत्तर शास्त्रों और प्राचीन ग्रंथों पर आधारित है। किसी भी प्रश्न पर क्लिक करें और विस्तृत, प्रमाणित उत्तर पढ़ें।