विस्तृत उत्तर
गीता का दूसरा अध्याय 'सांख्य योग' है — इसमें 72 श्लोक हैं और यह गीता का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है क्योंकि इसमें गीता के लगभग सभी मुख्य सिद्धांतों का बीज है।
अध्याय का क्रम
1अर्जुन की शरणागति (श्लोक 1-10)
अर्जुन अपनी असमर्थता स्वीकार करता है और कृष्ण को गुरु स्वीकार कर मार्गदर्शन माँगता है: *'शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्'* (2.7)
2आत्मा का अमरत्व — ज्ञान योग (श्लोक 11-30)
- ▸कृष्ण कहते हैं: तुम शोक के अयोग्य लोगों के लिए शोक कर रहे हो (2.11)।
- ▸'न जायते म्रियते वा कदाचिन्' (2.20) — आत्मा न जन्मती है, न मरती, न कभी नष्ट होती।
- ▸जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा शरीर बदलती है (2.22)।
3क्षत्रिय धर्म (श्लोक 31-38)
धर्मयुद्ध करना क्षत्रिय का कर्तव्य है। सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान मानकर युद्ध कर (2.38)।
4कर्मयोग (श्लोक 39-53)
- ▸'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' (2.47) — गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक।
- ▸निष्काम कर्म = बिना फल की इच्छा कर्म करना।
- ▸'समत्वं योग उच्यते' (2.48) — सिद्धि-असिद्धि में समभाव ही योग है।
5स्थितप्रज्ञ के लक्षण (श्लोक 54-72)
- ▸अर्जुन पूछता है: स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाला) कैसा होता है?
- ▸कृष्ण उत्तर देते हैं (2.55): जो सभी कामनाओं को त्यागकर आत्मा में ही संतुष्ट रहता है।
- ▸जो दुखों में विचलित नहीं, सुखों में लालसा नहीं, राग-भय-क्रोध से मुक्त — वह स्थितप्रज्ञ (2.56)।
- ▸इंद्रिय संयम, मन की स्थिरता, और वैराग्य की शिक्षा।
सारांश: यह अध्याय तीन प्रमुख शिक्षाएँ देता है — (1) आत्मा अमर है, शोक अज्ञान है (2) निष्काम कर्मयोग जीवन का मार्ग है (3) स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि) ही परम शांति प्राप्त करता है।





