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गीता ज्ञान📜 भगवद्गीता (9.22)2 मिनट पठन

गीता श्लोक 9.22 — अनन्याश्चिन्तयन्तो मां — अर्थ क्या?

संक्षिप्त उत्तर

गीता 9.22: 'जो अनन्य भाव से मेरा निरंतर चिंतन करते हैं, उनका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।' योग = अप्राप्त की प्राप्ति, क्षेम = प्राप्त की रक्षा। 'वहामि अहम्' = मैं स्वयं करता हूँ। शर्त: अनन्य भक्ति।

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विस्तृत उत्तर

गीता 9.22 भक्ति मार्ग का एक अत्यंत शक्तिशाली और आश्वस्त करने वाला श्लोक है।

मूल श्लोक

*अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥*

शब्दशः अर्थ

  • अनन्याः = अनन्य भाव से (किसी और का आश्रय न लेकर)
  • चिन्तयन्तः = चिंतन करते हुए
  • माम् = मुझे (कृष्ण/परमात्मा)
  • ये जनाः = जो लोग
  • पर्युपासते = निरंतर उपासना/भक्ति करते हैं
  • तेषाम् = उनका
  • नित्याभियुक्तानाम् = सदा मुझमें लगे रहने वालों का
  • योगक्षेमम् = योग (अप्राप्त की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त की रक्षा)
  • वहामि अहम् = मैं स्वयं वहन करता हूँ

पूर्ण अर्थ: 'जो लोग अनन्य भाव से (अन्य किसी का आश्रय न लेकर) मेरा निरंतर चिंतन और उपासना करते हैं, उन सदा मुझमें लगे रहने वाले भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ — अर्थात् जो उन्हें प्राप्त नहीं है वह मैं दिलाता हूँ, और जो प्राप्त है उसकी मैं रक्षा करता हूँ।'

'योगक्षेमं वहाम्यहम्' का विशेष महत्व

  • योग = जो नहीं है उसकी प्राप्ति (अप्राप्त को प्राप्त करना)
  • क्षेम = जो है उसकी रक्षा (प्राप्त को सुरक्षित रखना)
  • भगवान कहते हैं: 'मैं स्वयं (वहामि) इसका भार उठाता हूँ' — 'करवाता हूँ' नहीं, 'करता हूँ' — यह अनन्य भक्त के प्रति ईश्वर की व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी है।

शर्त: अनन्य भक्ति — केवल एक ईश्वर पर पूर्ण विश्वास, किसी और का सहारा नहीं।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद्गीता (9.22)
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