विस्तृत उत्तर
गीता श्लोक 18.66 को 'चरम श्लोक' (अंतिम/सर्वोच्च श्लोक) कहा जाता है — रामानुजाचार्य ने इसे गीता का सबसे महत्वपूर्ण श्लोक माना।
मूल श्लोक
*सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥*
शब्दशः अर्थ
- ▸सर्वधर्मान् = सभी धर्मों (कर्तव्यों/साधनों) को
- ▸परित्यज्य = त्यागकर
- ▸माम् एकम् = मुझ एक को
- ▸शरणम् व्रज = शरण में आ
- ▸अहम् = मैं (कृष्ण/परमात्मा)
- ▸त्वाम् = तुझे
- ▸सर्वपापेभ्यः = सभी पापों से
- ▸मोक्षयिष्यामि = मुक्त करूँगा
- ▸मा शुचः = शोक मत कर
पूर्ण अर्थ: 'सभी धर्मों (साधनों/कर्तव्यों) को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त करूँगा — शोक मत कर।'
व्याख्या (विभिन्न दृष्टिकोण)
- 1रामानुज (विशिष्टाद्वैत): यह प्रपत्ति (शरणागति) का सर्वोच्च उपदेश है। 'सर्वधर्मान्' = सभी अन्य साधनों (कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि) को छोड़कर केवल ईश्वर की शरण = सबसे सरल और सर्वोच्च मार्ग।
- 1शंकराचार्य (अद्वैत): 'सर्वधर्मान्' = सभी कर्मों को त्यागकर = निष्काम भाव से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करो।
- 1मध्वाचार्य (द्वैत): ईश्वर की पूर्ण भक्ति और समर्पण ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग।
'मा शुचः' (शोक मत कर) का महत्व
यह वचन भयमुक्ति और आश्वासन देता है — चाहे कितने भी पाप हों, ईश्वर की सच्ची शरण में जाने पर सब क्षमा होता है। यह गीता का सबसे आश्वस्त करने वाला वचन है।





