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गीता ज्ञान📜 श्रीमद्भगवद्गीता — 18 अध्याय; शंकराचार्य भाष्य, रामानुजाचार्य भाष्य, बाल गंगाधर तिलक — गीता रहस्य3 मिनट पठन

गीता का ज्ञान क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

गीता के मुख्य संदेश: आत्मा अमर है (शरीर नष्ट हो पर आत्मा नहीं); निष्काम कर्म करो — फल की चिंता छोड़ो; ज्ञान, भक्ति, कर्म और ध्यान — चारों मार्ग ईश्वर तक ले जाते हैं। अंतिम उपदेश: 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' — केवल ईश्वर की शरण में जाओ।

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विस्तृत उत्तर

भगवद्गीता का केंद्रीय ज्ञान 18 अध्यायों में फैला है। इसे शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और बाल गंगाधर तिलक ने विभिन्न दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया है:

गीता के पाँच केंद्रीय विषय

1आत्मा का ज्ञान (अध्याय 2)

> 'न जायते म्रियते वा कदाचित्... नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।' (2.20)

— आत्मा न जन्मती है, न मरती है। यह नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर यह नहीं मरती।

आत्मा के पाँच लक्षण (गीता 2.24)

  • अच्छेद्य — काटी नहीं जा सकती
  • अदाह्य — जलाई नहीं जा सकती
  • अक्लेद्य — गीली नहीं होती
  • अशोष्य — सुखाई नहीं जाती
  • नित्य — सदा रहती है

2निष्काम कर्म योग (अध्याय 3)

> 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

> मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।' (2.47)

— तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, फल में नहीं। फल की चिंता किए बिना कर्म करो।

यह गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध और क्रांतिकारी संदेश है।

3भक्ति योग (अध्याय 9 और 12)

> 'मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

> मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।' (9.34)

— मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे प्रणाम करो — तुम मुझे प्राप्त करोगे।

4ज्ञान योग (अध्याय 4 और 7)

> 'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।' (4.38)

— इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाली कोई वस्तु नहीं है।

5अवतार और धर्म संस्थापना

> 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

> अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

> परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

> धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।' (4.7-8)

गीता के चार मार्ग

  1. 1ज्ञान योग — विचार और विवेक से ईश्वर
  2. 2भक्ति योग — प्रेम और समर्पण से ईश्वर
  3. 3कर्म योग — निष्काम कर्म से ईश्वर
  4. 4राज योग (ध्यान) — अष्टांग योग से ईश्वर

गीता का अंतिम और सर्वोच्च उपदेश

> 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

> अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।' (18.66)

— सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा — चिंता मत करो।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भगवद्गीता — 18 अध्याय; शंकराचार्य भाष्य, रामानुजाचार्य भाष्य, बाल गंगाधर तिलक — गीता रहस्य
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