विस्तृत उत्तर
गीता में 700 श्लोक हैं और 'सबसे महत्वपूर्ण' का उत्तर व्यक्ति की स्थिति और मार्ग पर निर्भर करता है। फिर भी, विभिन्न आचार्यों और परंपराओं में कुछ श्लोक सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रभावशाली माने गए हैं:
1कर्मयोग का सार — गीता (2.47)
*'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥'*
— तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर कभी नहीं। यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है।
2शरणागति का सार — गीता (18.66)
*'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥'*
— सब छोड़कर मेरी शरण आ, मैं तुझे सभी पापों से मुक्त करूँगा। गीता का अंतिम और सर्वोच्च उपदेश। रामानुज ने इसे 'चरम श्लोक' कहा।
3अवतार सिद्धांत — गीता (4.7-8)
*'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत...'*
— जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं अवतार लेता हूँ।
4ज्ञान का सार — गीता (4.36-37)
*'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते...'*
— ज्ञान की अग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है।
5समत्व — गीता (2.48)
*'योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥'*
— सिद्धि-असिद्धि में समभाव रखकर कर्म करो — यह समत्व ही योग है।
6विश्वरूप — गीता (11.32)
*'कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो...'*
— मैं काल हूँ, लोकों का संहार करने वाला।
यदि एक ही चुनना हो: अधिकांश आचार्य गीता 2.47 (कर्मयोग) या गीता 18.66 (शरणागति) को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।

