विस्तृत उत्तर
गीता के 18 अध्यायों और 700 श्लोकों का सार एक पंक्ति में देना कठिन है, क्योंकि गीता बहुआयामी है। फिर भी विभिन्न दृष्टिकोण से:
कर्मयोग दृष्टि
*'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'* (2.47)
— फल की चिंता छोड़, कर्तव्य कर्म कर।
भक्ति दृष्टि
*'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'* (18.66)
— सब छोड़ ईश्वर की शरण ले।
ज्ञान दृष्टि
*'न जायते म्रियते वा कदाचिन्'* (2.20)
— आत्मा अमर है, शोक व्यर्थ।
समग्र सार (एक वाक्य)
'निष्काम भाव से अपना कर्तव्य करो, फल ईश्वर पर छोड़ो, और जानो कि आत्मा अविनाशी है।'
यह वाक्य कर्मयोग (निष्काम कर्म), भक्तियोग (ईश्वर समर्पण) और ज्ञानयोग (आत्मा का ज्ञान) — तीनों को समाहित करता है।
शंकराचार्य का सार
*'गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः'*
— गीता ही पर्याप्त है, अन्य शास्त्र विस्तार की क्या आवश्यकता।

