विस्तृत उत्तर
गीता का 15वाँ अध्याय 'पुरुषोत्तम योग' है — इसमें केवल 20 श्लोक हैं परंतु यह गीता के सबसे गहन अध्यायों में से एक है। गीता (15.20) में स्वयं कहा गया: *'इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ'* — यह सबसे गोपनीय शास्त्र मैंने कहा।
मुख्य विषय
1अश्वत्थ वृक्ष (संसार वृक्ष) — श्लोक 1-4
- ▸संसार को एक उल्टे पीपल के वृक्ष (अश्वत्थ) से उपमा दी गई — जिसकी जड़ें ऊपर (ब्रह्म में) और शाखाएँ नीचे (संसार में) हैं।
- ▸इस वृक्ष को वैराग्य रूपी शस्त्र से काटकर उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ से लौटना नहीं होता।
2जीवात्मा का स्वरूप — श्लोक 5-11
- ▸जीवात्मा ईश्वर का सनातन अंश है (15.7): *'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः'*
- ▸आत्मा शरीर से शरीर में जाते समय मन और इंद्रियों को साथ ले जाती है — जैसे वायु सुगंध को (15.8)।
3तीन पुरुष — श्लोक 16-18
- ▸क्षर पुरुष — संसार के सभी नाशवान प्राणी।
- ▸अक्षर पुरुष — अविनाशी आत्मा/माया।
- ▸पुरुषोत्तम — क्षर और अक्षर दोनों से परे, सर्वोच्च परमात्मा। *'यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः, अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः'* (15.18)
4परम ज्ञान — श्लोक 19-20
- ▸जो मुझे (कृष्ण को) पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ है और सम्पूर्ण भाव से मेरा भजन करता है (15.19)।
- ▸15.20: यह सबसे गोपनीय शास्त्र है — इसे जानने वाला बुद्धिमान और कृतार्थ हो जाता है।
महत्व: गीता महात्म्य में 15वें अध्याय को विशेष महत्वपूर्ण बताया गया है। कई परंपराओं में भोजन से पहले इस अध्याय का पाठ किया जाता है।





