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गीता दर्शन📜 भगवद गीता अध्याय 6/10-28, 8/12-14, 12/92 मिनट पठन

गीता में ध्यान का महत्व क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

गीता अध्याय 6 (ध्यानयोग) के अनुसार नित्य ध्यान से परम शांति और निर्वाण मिलता है (6/15)। चंचल मन को बार-बार आत्मा में वापस लाना ही ध्यान का अभ्यास है। ध्यान का प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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विस्तृत उत्तर

## गीता में ध्यान का महत्व

गीता अध्याय 6 — ध्यानयोग

गीता का छठा अध्याय 'आत्मसंयमयोग' या 'ध्यानयोग' है। इसमें श्रीकृष्ण ने ध्यान की विधि, महत्व और फल विस्तार से बताए हैं।

ध्यान का महत्व — गीता के प्रमुख श्लोक

### 1. ध्यान का फल (6/15)

*'युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।

शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।'*

— जो योगी इस प्रकार अपने मन को नियत करके नित्य ध्यान करता है, वह परम शांति और निर्वाण को प्राप्त करता है।

### 2. भटके मन को वापस लाओ (6/26)

*'यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।

ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।'*

— यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटके, वहाँ-वहाँ से रोककर आत्मा में ही वापस लाओ।

### 3. प्राणायाम-ध्यान (8/12-13)

इंद्रियों को रोककर, प्राण को भ्रूमध्य में स्थिर करके, 'ॐ' का उच्चारण करते हुए ध्यान करने से परम गति मिलती है।

### 4. मन को मुझमें लगाओ (12/9)

*'अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।'*

— यदि मन को स्थिर नहीं कर सकते, तो अभ्यास-योग से मुझे पाने की इच्छा करो।

ध्यान से लाभ (गीता अनुसार)

  • चित्त की एकाग्रता
  • इंद्रियों पर नियंत्रण
  • स्थितप्रज्ञता (समभाव)
  • परम शांति और निर्वाण
  • ईश्वर-साक्षात्कार

असफल योगी का भाग्य (6/41-45)

जो इस जन्म में ध्यान पूर्ण नहीं कर पाता, वह अगले जन्म में श्रेष्ठ कुल में जन्म लेता है और वहाँ से आगे बढ़ता है — ध्यान का प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद गीता अध्याय 6/10-28, 8/12-14, 12/9
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