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गीता दर्शन📜 भगवद गीता 2/47, 3/5, 3/19, 4/14, 5/10, 18/472 मिनट पठन

गीता में कर्म का सिद्धांत क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

गीता का कर्म-सिद्धांत (2/47) कहता है — कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। निष्काम कर्म, ईश्वर-अर्पण भाव और स्वधर्म-पालन — ये गीता के कर्मयोग के तीन स्तंभ हैं।

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विस्तृत उत्तर

## गीता में कर्म का सिद्धांत

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक (2/47)

*'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।'*

— कर्म करना तुम्हारा अधिकार है, फल की इच्छा मत करो। न फल के लिए कर्म करो, न कर्म से विरत हो जाओ।

गीता के कर्म-सिद्धांत के मुख्य बिंदु

### 1. कर्म अनिवार्य है (3/5)

*'न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।'*

— कोई भी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण सबको कर्म में लगाते हैं।

### 2. निष्काम कर्म ही श्रेष्ठ (3/19)

फल की इच्छा रहित कर्म ही कर्मयोग है। इससे चित्त शुद्ध होता है और मोक्ष मिलता है।

### 3. ईश्वर-अर्पण भाव (5/10)

जो कमल की तरह कर्म में लिप्त नहीं होता, जो सभी कर्म ब्रह्म को अर्पण करता है — वह पाप से नहीं बंधता।

### 4. स्वधर्म-पालन (18/47)

*'श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।'*

— अच्छी तरह पालन किए गए पर-धर्म से अपना दोषपूर्ण धर्म भी श्रेष्ठ है।

### 5. कर्ता-भाव का त्याग (4/14)

*'मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।'*

— 'मैं कर्ता हूँ' — यह भाव त्यागकर ईश्वर को निमित्त मानकर कर्म करने वाला मुक्त हो जाता है।

कर्म के प्रकार (गीता 18/15-18)

  • सात्विक कर्म — बिना फल की इच्छा, राग-द्वेष के बिना
  • राजसिक कर्म — अहंकार और फल की इच्छा से
  • तामसिक कर्म — परिणाम की चिंता किए बिना मोहवश
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शास्त्रीय स्रोत
भगवद गीता 2/47, 3/5, 3/19, 4/14, 5/10, 18/47
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