विस्तृत उत्तर
## गीता में कर्म का सिद्धांत
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक (2/47)
*'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।'*
— कर्म करना तुम्हारा अधिकार है, फल की इच्छा मत करो। न फल के लिए कर्म करो, न कर्म से विरत हो जाओ।
गीता के कर्म-सिद्धांत के मुख्य बिंदु
### 1. कर्म अनिवार्य है (3/5)
*'न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।'*
— कोई भी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण सबको कर्म में लगाते हैं।
### 2. निष्काम कर्म ही श्रेष्ठ (3/19)
फल की इच्छा रहित कर्म ही कर्मयोग है। इससे चित्त शुद्ध होता है और मोक्ष मिलता है।
### 3. ईश्वर-अर्पण भाव (5/10)
जो कमल की तरह कर्म में लिप्त नहीं होता, जो सभी कर्म ब्रह्म को अर्पण करता है — वह पाप से नहीं बंधता।
### 4. स्वधर्म-पालन (18/47)
*'श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।'*
— अच्छी तरह पालन किए गए पर-धर्म से अपना दोषपूर्ण धर्म भी श्रेष्ठ है।
### 5. कर्ता-भाव का त्याग (4/14)
*'मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।'*
— 'मैं कर्ता हूँ' — यह भाव त्यागकर ईश्वर को निमित्त मानकर कर्म करने वाला मुक्त हो जाता है।
कर्म के प्रकार (गीता 18/15-18)
- ▸सात्विक कर्म — बिना फल की इच्छा, राग-द्वेष के बिना
- ▸राजसिक कर्म — अहंकार और फल की इच्छा से
- ▸तामसिक कर्म — परिणाम की चिंता किए बिना मोहवश





