विस्तृत उत्तर
## गीता में आत्मा का वर्णन
गीता अध्याय 2 — आत्मा का सर्वश्रेष्ठ वर्णन
### आत्मा के गुण (2/17-25):
1अविनाशी
*'अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।'* (2/17)
— जो इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। इसे कोई नष्ट नहीं कर सकता।
2अजन्मा और नित्य
*'न जायते म्रियते वा कदाचिन्।'* (2/20)
— आत्मा न कभी जन्मती है, न मरती है, न पैदा होती है, न नष्ट होती है। यह प्राचीन, शाश्वत और नित्य है।
3अछेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य
*'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।'* (2/23)
— इसे शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता, वायु सुखा नहीं सकती।
4अव्यक्त और अचिन्त्य
आत्मा इंद्रियों और मन से परे है — इसे तर्क से नहीं, केवल अनुभव से जाना जा सकता है।
5देह परिवर्तन
*'वासांसि जीर्णानि यथा विहाय।'* (2/22)
— जैसे पुराने वस्त्र छोड़कर नए धारण किए जाते हैं, वैसे आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया लेती है।
आत्मा और परमात्मा (15/7)
*'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।'*
— इस जीव-लोक में जीव मेरा ही सनातन अंश है।
उपनिषद का साम्य
कठोपनिषद (2/19) में यमराज ने नचिकेता को यही सत्य बताया — *'हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्'* — जो मारने वाला समझे कि मैं मारता हूँ, और जो मरने वाला समझे कि मैं मरता हूँ — दोनों अज्ञानी हैं।





