विस्तृत उत्तर
गीता में ज्ञान योग
ज्ञान योग = आत्मा, ब्रह्म और जगत् के यथार्थ स्वरूप को जानकर मोक्ष प्राप्त करना। यह चिंतनशील और विवेकशील साधकों के लिए उपयुक्त मार्ग है।
गीता 3.3 में श्रीकृष्ण ने कहा
*'ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्'* — ज्ञान योग साँख्य (विचारक) के लिए है, कर्म योग योगी (सक्रिय) के लिए।
ज्ञान योग के मूल तत्त्व
1आत्मज्ञान
आत्मा अजन्मा, अमर, नित्य और अविनाशी है। शरीर के नश्वर होने का बोध ही ज्ञान की पहली सीढ़ी है।
2स्थितप्रज्ञ की अवस्था
गीता 2.55 में स्थितप्रज्ञ की परिभाषा — जो स्वार्थयुक्त कामनाएँ त्याग देता है, जो दुख में क्षुब्ध नहीं होता, सुख की लालसा नहीं करता, और आसक्ति-भय-क्रोध से मुक्त है।
3क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेक (अध्याय 13)
शरीर = क्षेत्र। आत्मा = क्षेत्रज्ञ। इनका विवेक ज्ञान योग का मूल है।
4कर्म में ज्ञान
गीता 4 (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा — *'सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।'* — समस्त कर्म ज्ञान में परिसमाप्त होते हैं।
5समदर्शिता
ज्ञानी महापुरुष ब्राह्मण, चाण्डाल, गाय, हाथी, कुत्ते — सभी में समान परमात्मा को देखता है (गीता 5.18)।
सीमाएँ
ज्ञान योग कठिन है — इसके लिए विवेक, वैराग्य और तीव्र मुमुक्षा चाहिए। सामान्य गृहस्थ के लिए कर्म योग और भक्ति योग अधिक व्यावहारिक हैं।





